प्रभुदयाल श्रीवास्तव की प्रसिद्ध बाल-कविताएँ

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की प्रसिद्ध बाल-कविताएँ

हवा महल: बाल-कविता [19]

किसी जादूगर ने
निहत्थे आकाश की हवा में,
छड़ी घुमाकर और छूमंतर बोलकर,
नहीं बनाया है हवा महल।

न ही गुब्बारे में कैद
आंधी का कोई चुन्धियाता गुबार है यह।
यह किसी वास्तु शिल्पी की
कल्पना मात्र भी नहीं है।

यह गुलाबी नगरी के वक्ष स्थल पर
राजस्थानी वास्तु कला का
उसकी संस्कृति से साक्षात्कार है।

जिसमें सैकड़ों मधुमक्खियों के
छत्तों के आकार के झरोखे हैं
गवाक्ष हैं और
नन्हीं नन्हीं खिड़कियाँ भी।

इन्हीं से मिलती थी शाही सुकुमारियों को
शीतल ठंडी हवा।
इन्हीं झरोखों पर रखी रहतीं थीं
जिज्ञासु आँखें इनकीं।

निहारतीं राजपथों पर होते
जलसों को,
गण गौर तीज की परंपरा को।

मादल की थाप  पर होते लोक नृत्यों और
होली के मादक सुगन्धित रंगों को
बिसूरती  ये ललनाएं,
कनक तीलियों के पिंजरे में बंद
शुकों जैसी,
अपने समय का इतिहास लिखती रहीं।

और इन्हीं की  सुरक्षा में बनते रहे
बेजोड़ महल और किले।
सैलानी आते हैं ,देखते हैं यह शिल्प
यहाँ की अनोखी  स्थापत्य कला
अविरल अविराम, होकर भौंचक।

लाल बलुआ पत्थरों से
मुकुट के आकार की काया लिए
यह राजस्थान का हवा महल है।
यह भारत की धरोहर है।

~ प्रभुदयाल श्रीवास्तव [Updated On: 23 July, 2026]

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