प्रभुदयाल श्रीवास्तव की प्रसिद्ध बाल-कविताएँ

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की प्रसिद्ध बाल-कविताएँ

नदी बनूँ: प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल-कविता [8]

कभी-कभी होती है इच्छा,
नदी बनूँ मैं, बहती जाऊं।
खड़े, किनारों के पेड़ों के,
गले लगूँ फिर हाथ मिलाऊँ।

कभी-कभी लगता है ऐसा,
मेंढक बन मैं भी टर्राऊँ।
धवल रेत में ठंडी-ठंडी,
रुकूँ और कुछ पल सुस्ताऊं।

कभी रात में चंदा देखूँ,
अपने जल में उसे छुपाऊँ।
सब तारों को पकड़-पकड़ कर,
अपने ऊपर मैं तैराऊं।

कभी-कभी लहरें बन उछलूँ,
और किनारों से टकराऊं।
कभी सीढ़ियों पर बैठूँ मैं,
कभी उछलकर वापस आऊँ।

घाटी, पत्थर, चट्टानों को,
हर-हर के मैं गीत सुनाऊँ।
देख कछारों, तीरों को खुश,
मैं हंस लूँ हंस कर इतराऊँ।

बनूँ सहायक खेतों की मैं,
मैं फसलें भरपूर दिलाऊँ,
एक साथ बकरी शेरों को,
अपने तट का नीर पिलाऊँ।

~ प्रभुदयाल श्रीवास्तव

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