काले-काले उमड़कर बादल, लाए पानी भरकर बादल। बादलों ने जब डाला डेरा, छाया आकाश में घोर अंधेरा। दूर से आया चलकर बादल, लाया पानी भरकर बादल॥ बच्चा बूढा नहीं कोई उदास, बुझेगी तपती धरती की प्यास। नहीं भागेगा डर के बादल, लाया पानी भरकर बादल॥ धरा से लेकर पर्वत की चोटी, गिरी उन पर बूंदे मोटी-मोटी। बरसेगा आज जमकर बादल, …
Read More »गीत फरोश – भवानी प्रसाद मिश्र
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ, मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ, मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ। जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा, बेकाम नहीं हैं, काम बताऊँगा, कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने, कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने, यह गीत सख्त सर-दर्द भुलाएगा, यह गीत पिया को पास बुलाएगा। जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी …
Read More »दो भाई
चुन्नू मुन्नू थे दो भाई, रसगुल्ले पर हुई लड़ाई। चुन्नू बोला, मैं लूंगा, मुन्नू बोला, कभी न दूंगा। झगड़ा सुनकर मम्मी आई, प्यार से एक बात बताई। आधा ले तू चुन्नू बेटा, आधा ले तू मुन्नू बेटा। ऐसा झगड़ा कभी न करना, दोनों मिलकर प्रेम से रहना।
Read More »गुड़िया – महजबीं
मेरी गुड़िया बहुत प्यारी नाम उसका राजकुमारी। पहले थी मैं कितनी अकेली अब यह है मेरी सहेली। करती है मुझसे बातें दिन भर भी हम साथ बिताते। काटते हैं अब दिन कितने अच्छे नहीं थे पहले उतने अच्छे। ∼ महजबीं
Read More »दो चूहे
दो चूहे थे, मोटे-मोटे थे, छोटे-छोटे थे। नाच रहे थे, खेल रहे थे, कूद रहे थे। बिल्ली ने कहा, म्याऊँ (मैं आऊँ)। ना मौसी ना, हमें मार डालोगी। फिर खा जाओगी, हम तो नहीं आएँगे। हम तो भाग जाएँगे।
Read More »ध्यान रखेंगे – दिविक रमेश
मेरी बिल्ली आंछी-आंछी, अरे हो गया उसे जुकाम। जा चूहे ललचा मत जी को, करने दो उसको आराम। दूध नहीं अब चाय चलेगी, थोड़ा हलुवा और दवाई। लग ना जाए आंछी हमको, ध्यान रखेंगे अपना भाई। ∼ डॉ. दिविक रमेश
Read More »हाथी बोला – दिविक रमेश
सूँड उठा कर हाथी बोला बोला क्या तन उसका डोला बोला तो मन मेरा बोला देखो देखो अरे हिंडोला “आओ बच्चो मिलजुल आओ आओ बैठो तुम्हें डुलाऊँ मस्त मस्त चल, मस्त मस्त चल झूम झूम कर तुम्हें घुमाऊँ घूम घूम कर, झूम झूम कर ले जाऊँगा नदी किनारे सूँड भरूँगा पानी से मैं छोडूँगा तुम पर फव्वारे।” ∼ डॉ. दिविक रमेश
Read More »हाथी राजा बहुत भले
हाथी राजा बहुत भले। सूंड हिलाते कहाँ चले ? कान हिलाते कहाँ चले ? मेरे घर भी आओ ना, हलवा पूरी खाओ ना। आओ बैठो कुर्सी पर, कुर्सी बोले चटर मटर।
Read More »कनुप्रिया (इतिहास: उसी आम के नीचे) – धर्मवीर भारती
उस तन्मयता में तुम्हारे वक्ष में मुँह छिपाकर लजाते हुए मैंने जो-जो कहा था पता नहीं उसमें कुछ अर्थ था भी या नहीं: आम्र-मंजरियों से भरी माँग के दर्प में मैंने समस्त जगत् को अपनी बेसुधी के एक क्षण में लीन करने का जो दावा किया था – पता नहीं वह सच था भी या नहीं: जो कुछ अब भी …
Read More »कनुप्रिया (इतिहास: विप्रलब्धा) – धर्मवीर भारती
बुझी हुई राख, टूटे हुए गीत, बुझे हुए चाँद, रीते हुए पात्र, बीते हुए क्षण-सा– –मेरा यह जिस्म कल तक जो जादू था, सूरज था, वेग था तुम्हारे आश्लेष में आज वह जूड़े से गिरे हुए बेले-सा टूटा है, म्लान है दुगुना सुनसान है बीते हुए उत्सव-सा, उठे हुए मेले-सा– मेरा यह जिस्म– टूटे खंडहरों के उजाड़ अन्तःपुर में छूटा …
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