Poems In Hindi

बच्चों की हिन्दी कविताएं — 4to40 का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children. पढ़िए कुछ मजेदार, चुलबुली, नन्ही और बड़ी हिंदी कविताएँ. इस संग्रह में आप को बच्चो और बड़ो के लिए ढेर सारी कविताएँ मिलेंगी.

दुनिया एक खिलौना – निदा फ़ाज़ली

दुनिया एक खिलौना - निदा फ़ाज़ली

दुनिया जिसे कहते हैं‚ जादू का खिलौना है मिल जाए तो मिट्टी है‚ खो जाए तो सोना है। अच्छा सा कोई मौसम‚ तन्हा सा कोई आलम हर वक्त का रोना तो‚ बेकार का रोना है। बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने किस रााह से बचना है, किस छत को भिगोना है। ग़मा हो या खुशी दोनो कुछ देर …

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दिवंगत मां के नाम पत्र – अशोक वाजपेयी

दिवंगत मां के नाम पत्र – अशोक वाजपेयी

व्यर्थ के कामकाज में उलझे होने से देर हो गई थी और मैं अंतिम क्षण तुम्हारे पास नहीं पहुँच पाया था! तुम्हें पता नहीं उस क्षण सब कुछ से विदा लेते मुझ अनुपस्थित से भी विदा लेना याद रहा कि नहीं जीवन ने बहुत अपमान दिया था पर कैंसर से मृत्यु ने भी पता नहीं क्यों तुम्हारी लाज नहीं रखी …

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धूप की चादर – दुष्यंत कुमार

धूप की चादर - दुष्यंत कुमार

कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए, कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए। जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा, बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए। खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को, अब अपनी–अपनी हथेली जला के बैठ गए। दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो, तमाशबीन दुकानें लगा के …

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चल मियाँ – जेमिनी हरियाणवी

चल मियाँ - जेमिनी हरियाणवी

आज कल पड़ती नहीं है कल मियाँ छोड़ कर दुनियां कहीं अब चल मियाँ रात बिजली ने परेशां कर दिया सुबह धोखा दे गया है नल मियाँ लग रही है आग देखे जाइये पास तेरे जल नहीं तो जल मियाँ लाख वे उजले बने फिरते रहें कोठरी में उनके है काजल मियाँ आज ये दल कल नया परसों नया देश …

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उत्तर न होगा वह – बालकृष्ण राव

उत्तर न होगा वह – बालकृष्ण राव

कोई दुख नया नहीं है सच मानो, कुछ भी नहीं है नया कोई टीस, कोई व्यथा, कोई दाह कुछ भी, कुछ भी तो नहीं हुआ। फिर भी न जाने क्यों उठती–सी लगती है अंतर से एक आह जाने क्यों लगता है थोड़ी देर और यदि ऐसे ही पूछते रहोगे तुम छलक पड़ेगा मेरी आँखों से अनायास प्रश्न ही तुम्हारा यह …

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सुदामा चरित – नरोत्तम दास

सुदामा चरित - नरोत्तम दास

ज्ञान के सामने धन की महत्वहीनता सुदाम पत्नी को बताते हैंः सिच्छक हौं सिगरे जग के तिय‚ ताको कहां अब देति है सिच्छा। जे तप कै परलोक सुधारत‚ संपति की तिनके नहि इच्छा। मेरे हिये हरि के पद–पंकज‚ बार हजार लै देखि परिच्छा औरन को धन चाहिये बावरि‚ ब्राह्मन को धन केवल भिच्छा सुदामा पत्नी अपनी गरीबी बखानती हैः कोदों …

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हाथी दादा – रामानुज त्रिपाठी

हाथी दादा – रामानुज त्रिपाठी

सूट पहन कर हाथी दादा चौराहे पर आए, रिक्शा एक इशारा कर के वे तुरंत रुकवाए। चला रही थी हाँफ–हाँफ कर रिक्शा एक गिलहरी बोले हाथी दादा मैडम ले चल मुझे कचहरी। तब तरेर कर आँखें वह हाथी दादा से बोली, लाज नहीं आती है तुमको करते हुए ठिठोली। अपना रिक्शा करूँ कबाड़ा तुमको यदि बैठा लूँ जान बूच कर …

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गाय (भारत–भारती से) – मैथिली शरण गुप्त

गाय (भारत–भारती से) – मैथिली शरण गुप्त

है भूमि बन्ध्या हो रही, वृष–जाति दिन भर घट रही घी दूध दुर्लभ हो रहा, बल वीय्र्य की जड़ कट रही गो–वंश के उपकार की सब ओर आज पुकार है तो भी यहाँ उसका निरंतर हो रहा संहार है दाँतों तले तृण दाबकर हैं दीन गायें कह रहीं हम पशु तथा तुम हो मनुज, पर योग्य क्या तुमको यही? हमने …

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अपराध – नसीम अख्तर

अपराध - नसीम अख्तर

संकरी, अंधेरी गीली गीली गलियों के दड़बेनुमा घरों की दरारों से आज भी झांकते हैं डर भरी आंखों और सूखे होंठों वाले मुरझाए, पीले निर्भाव, निस्तेज चेहरे जिन का एक अलग संसार है और है एक पूरी पीढ़ी जो सदियों से भोग रही है उन कर्मों का दंड जो उन्होंने किए ही नहीं अनजाने ही हो जाता है उन से …

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हौंसले – रेखा चंद्रा

हौंसले - रेखा चंद्रा

खुले आसमान में करे परवाज हौसले हर पंछी में नहीं होते सिर्फ बहार ही तो नहीं बाग में ठूंठ भी यहां कम नहीं होते सीप में बने मोती हर बूंद के ऐसे मौके नहीं होते आंख में आंसू होंठों पर मुसकान ऐसे दीवाने भी कम नहीं होते जहां जाएं रोने के लिए ऐसे कोने हर घर में नहीं होते मरने …

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