Poems In Hindi

बच्चों की हिन्दी कविताएं — 4to40 का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children. पढ़िए कुछ मजेदार, चुलबुली, नन्ही और बड़ी हिंदी कविताएँ. इस संग्रह में आप को बच्चो और बड़ो के लिए ढेर सारी कविताएँ मिलेंगी.

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये: दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये: दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये, कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये। यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये। न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये। ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही, …

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हो गई है पीर पर्वत: दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत: दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये …

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एक सीढ़ी और: कुंवर बेचैन

एक सीढ़ी और: कुंवर बेचैन

एक सीढ़ी और चढ़ आया समय इस साल जाने छत कहाँ है। प्राण तो हैं प्राण जिनको देह–धनु से छूटना है, जिंदगी – उपवास जिसको शाम के क्षण टूटना है, हम समय के हाथ से छूटे हुए रूमाल, जाने छत कहाँ है। यह सुबह, यह शाम बुझते दीपकों की व्यस्त आदत और वे दिन–रात कोने से फटे जख्मी हुए ख़त …

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एक पूरा दिन: राजीव कृष्ण सक्सेना

एक पूरा दिन: राजीव कृष्ण सक्सेना

आज नहीं धन आशातीत कहीं से पाया‚ ना हीं बिछड़े साजन ने आ गले लगाया। शत्रु विजय कर नहीं प्रतिष्ठा का अधिकारी‚ कुछ भी तो उपलब्धि नहीं हो पाई भारी। साधारण सा दिन‚ विशेष कुछ बात नहीं थी‚ कोई जादू नहीं‚ नयन की घात नहीं थी। झलक नहीं पाते जो स्मृति के आभासों में‚ जिक्र नहीं होता है जिनका इतिहासों …

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अवगुंठित: सुमित्रानंदन पंत

अवगुंठित सुमित्रानंदन पंत का कविता संग्रह है। वह कैसी थी, अब न बता पाऊंगा वह जैसी थी। प्रथम प्रणय की आँखों से था उसको देखा, यौवन उदय, प्रणय की थी वह प्रथम सुनहली रेखा। ऊषा का अवगुंठन पहने, क्या जाने खग पिक के कहने, मौन मुकुल सी, मृदु अंगो में, मधुऋतु बंदी कर लाई थी! स्वप्नों का सौंदर्य, कल्पना का …

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एक भी आँसू न कर बेकार: रामावतार त्यागी

एक भी आँसू न कर बेकार: रामावतार त्यागी

एक भी आँसू न कर बेकार जाने कब समंदर मांगने आ जाए! पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है यह कहावत है‚ अमरवाणी नहीं है और जिस के पास देने को न कुछ भी एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है कर स्वयं हर गीत का श्रंगार जाने देवता को कौन सा भा जाय! चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण …

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एक बूंद: अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

एक बूंद: अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी सोचने फिर फिर यही मन में लगी आह क्यों घर छोड़ कर मैं यों बढ़ी। दैव मेरे भाग्य में है क्या बदा मैं बचूंगी या मिलूंगी धूल में या जलूंगी गिर अंगारे पर किसी चू पड़ूंगी या कमल के फूल में। बह गई उस काल कुछ …

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जब नींद नहीं आती होगी: रामेश्वर शुक्ल अंचल

जब नींद नहीं आती होगी: रामेश्वर शुक्ल अंचल

क्या तुम भी सुधि से थके प्राण ले–लेकर अकुलाती होगी, जब नींद नहीं आती होगी! दिन भर के कार्य भार से थक – जाता होगा जूही–सा तन, श्रम से कुम्हला जाता होगा मृदु कोकाबेली–सा आनन। लेकर तन–मन की श्रांति पड़ी – होगी जब शय्या पर चंचल, किस मर्म वेदना से क्रंदन करता होगा प्रति रोम विकल, अाँखो के अम्बर से …

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दूर का सितारा: निदा फ़ाज़ली

दूर का सितारा: निदा फ़ाज़ली

मैं बरसों बाद अपने घर को तलाश करता हुआ अपने घर पहुंचा लेकिन मेरे घर में अब मेरा घर कहीं नहीं था अब मेरे भाई अजनबी औरतों के शौहर बन चुके थे मेरे घर में अब मेरी बहनें अनजान मर्दों के साथ मुझसे मिलने आती थीं अपने­अपने दायरों में तक्.सीम मेरे भाई­ बहन का प्यार अब सिर्फ तोहफों का लेन­देन …

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चिट्ठी है किसी दुखी मन की: कुंवर बेचैन

चिट्ठी है किसी दुखी मन की: कुंवर बेचैन

बर्तन की यह उठका पटकी यह बात बात पर झल्लाना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। यह थकी देह पर कर्मभार इसको खांसी उसको बुखार जितना वेतन उतना उधार नन्हें मुन्नों को गुस्से में हर बार मार कर पछताना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। इतने धंधे यह क्षीणकाय ढोती ही रहती विवश हाय खुद ही उलझन खुद ही उपाय …

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