Rajiv Krishna Saxena

प्रो. राजीव कृष्ण सक्सेना - जन्म 24 जनवरी 1951 को दिल्ली मे। शिक्षा - दिल्ली विश्वविद्यालय एवं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में। एक वैज्ञानिक होने पर भी प्रोफ़ेसर सक्सेना को हिंदी सहित्य से विशेष प्रेम है। उन्होंने श्रीमद भगवतगीता का हिंदी में मात्राबद्ध पद्यानुवाद किया जो ''गीता काव्य माधुरी'' के नाम से पुस्तक महल दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुआ है। प्रोफ़ेसर सक्सेना की कुछ अन्य कविताएँ विभिन्न पत्रिकाओं मे छप चुकी हैं। उनकी कविताएँ लेख एवम गीता काव्य माधुरी के अंश उनके website www.geeta-kavita.com पर पढ़े जा सकते हैं।

देश मेरे: राजीव कृष्ण सक्सेना

देश मेरे - राजीव कृष्ण सक्सेना

It was many many years ago when I was faced with the question of staying back in USA or return to India. Career and material considerations would have us stay back but deep rooted tug on heart would urge us to pack up and leave. As any pravasi Indian would testify, this is quite a heart wrenching decision to take. …

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मजबूर भारतीय प्रवासी पर हिंदी कविता: विवशता

Nostalgia Hindi Poem on Helplessness विवशता

जो लोग भारत छोड़कर विश्व के दूसरे देशों में जा बसे हैं उन्हे प्रवासी भारतीय कहते हैं । ये विश्व के अनेक देशों में फैले हुए हैं। 48 देशों में रह रहे प्रवासियों की जनसंख्या करीब 2 करोड़ है। इनमें से 11 देशों में 5 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीय वहां की औसत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं और वहां …

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रिम झिम बरस रहा है पानी: मानसून बारिश पर कविता

रिम झिम बरस रहा है पानी - राजीव कृष्ण सक्सेना

वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तरी गोलार्द्ध में जो अतिआक्रामक प्रदूषण हो रहा है, उससे दक्षिणी गोलार्द्ध प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकता है? थर्मल पॉवर प्लांट्स से निकलने वाली कार्बन डाई-ऑक्साइड और सल्फर डाई-ऑक्साइड दुनिया के कई-कई देशों सहित भारत में भी तबाही मचा रही है। इंपीरियल कॉलेज, लंदन के एक शोध में बताया गया है कि यूरोप में …

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राजीव कृष्ण सक्सेना की धार्मिक कविता: मैं ही हूं

Rajiv Krishna Saxena's Devotional Hindi Poem मैं ही हूं

We humans see the world and interpret it as per our mental capacities. We try to make a sense out of this world by giving many hypotheses. But reality remains beyond us, a matter of constant speculation. मैं ही हूँ प्रभु पुत्र आपका, चिर निष्ठा से चरणों में नित बैठ नाम का जप करता हूँ मैं हीं सिक्का खरा, कभी …

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गया साल: राजीव कृष्ण सक्सेना

Hindi Poem about Demonetization & New Year गया साल

यूँ तो हर साल गुजर जाता है अबकी कुछ बात ही निराली है कुछ गए दिन बहुत कठिन गुजरे मन मुरादों की जेब खाली है। कि एक फूल जिसका इंतजार सबको था उसकी पहली कली है डाली पर दिल में कुछ अजब सी उमंगें हैं और नजरें सभी की माली पर कि एक फूल जिसका इंतजार सबको था उसकी खुशबू …

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एक पूरा दिन: राजीव कृष्ण सक्सेना

एक पूरा दिन: राजीव कृष्ण सक्सेना

आज नहीं धन आशातीत कहीं से पाया‚ ना हीं बिछड़े साजन ने आ गले लगाया। शत्रु विजय कर नहीं प्रतिष्ठा का अधिकारी‚ कुछ भी तो उपलब्धि नहीं हो पाई भारी। साधारण सा दिन‚ विशेष कुछ बात नहीं थी‚ कोई जादू नहीं‚ नयन की घात नहीं थी। झलक नहीं पाते जो स्मृति के आभासों में‚ जिक्र नहीं होता है जिनका इतिहासों …

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कृष्ण मुक्ति: राजीव कृष्ण सक्सेना

कृष्ण मुक्ति: राजीव कृष्ण सक्सेना

कितना लम्बा था जीवन पथ, थक गए पाँव डेग भर भर कर, ढल रही साँझ अब जीवन की, सब कार्य पूर्ण जग के इस पल। जान मानस में प्रभु रूप जड़ा, यह था उत्तरदायित्व बड़ा, सच था या मात्र छलावा था, जनहित पर मैं प्रतिबद्ध अड़ा। अब मुक्ति मात्र की चाह शेष, अब तजना है यह जीव वेश, प्रतिविम्ब देह …

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दीवाली आने वाली है: राजीव कृष्ण सक्सेना

दीवाली आने वाली है - राजीव कृष्ण सक्सेना

मानसून काफूर हो गया रावण का भी दहन हो गया ठंडी–ठंडी हवा चली है मतवाली अब गली–गली है पापा, मम्मी, भैय्या, भाभी बूआ, चाचा, दादा, दादी राह सभी तकते हैं मिल कर हर मन को भाने वाली है दीवाली आने वाली है चॉकलेट को छोड़ो भाई देसी है दमदार मिठाई लड्डू, पेड़ा, कलाकंद है बरफी दानेदार नरम है गरम जलेबी, …

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निष्क्रियता – राजीव कृष्ण सक्सेना

निष्क्रियता - राजीव कृष्ण सक्सेना

कहां तो सत्य की जय का ध्वजारोहण किया था‚ कहां अन्याय से नित जूझने का प्रण लिया था‚ बुराई को मिटाने के अदम उत्साह को ले‚ तिमिर को दूर करने का तुमुल घोषण किया था। बंधी इन मुठ्ठियों में क्यों शिथिलता आ रही है? ये क्यों अब हाथ से तलवार फिसली जा रही है? निकल तरकश से रिपुदल पर बरसने …

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मदारी का वादा – राजीव कृष्ण सक्सेना

मदारी का वादा - राजीव कृष्ण सक्सेना

बहुत तेज गर्मी है आजा सुस्ता लें कुछ पीपल की छैयां में पसीना सुख लें कुछ थका हुआ लगता है मुझे आज बेटा तू बोल नहीं सकता पर नहीं छुपा मुझसे कुछ कितनी ही गलियों में कितने चुबारों में दिखलाया खेल आज कितने बाज़ारों में कितनी ही जगह आज डमरू डम डम बोला बंसी की धुन के संग घुमा तू …

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