मांझी न बजाओ बंशी मेरा मन डोलता। मेरा मन डोलता जैसे जल डोलता। जल का जहाज जैसे पल पल डोलता। मांझी न बजाओ बंशी‚ मेरा मन डोलता। मांझी न बजाओ बंशी मेरा प्रन टूटता‚ मेरा प्रन टूटता जैसे तृन टूटता‚ तृन का निवास जैसे वन वन टूटता। मांझी न बजाओ बंशी‚ मेरा प्रन टूटता। मांझी न बजाओ बंशी मेरा तन …
Read More »कौन गाता जा रहा है – विद्यावती कोकिल
कौन गाता जा रहा है? मौनता को शब्द देकर शब्द में जीवन संजोकर कौन बंदी भावना के पर लगाता जा रहा है कौन गाता जा रहा है? घोर तम में जी रहे जो घाव पर भी घाव लेकर कौन मति के इन अपंगों को चलाता जा रहा है कौन गाता जा रहा है? कौन बिछुड़े मन मिलाता और उजड़े घर …
Read More »जिस तट पर – बुद्धिसेन शर्मा
जिस तट पर प्यास बुझाने से अपमान प्यार का होता हो‚ उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा मर जाना बेहतर है। जब आंधी‚ नाव डुबो देने की अपनी ज़िद पर अड़ जाए‚ हर एक लहर जब नागिन बनकर डसने को फन फैलाए‚ ऐसे में भीख किनारों की मांगना धार से ठीक नहीं‚ पागल तूफानों को बढ़कर आवाज लगाना बेहतर …
Read More »जागे हुए मिले हैं कभी सो रहे हैं हम – निदा फ़ाजली
जागे हुए मिले हैं कभी सो रहे हैं हम मौसम बदल रहे हैं बसर हो रहे हैं हम बैठे हैं दोस्तों में ज़रूरी हैं क़हक़हे सबको हँसा रहे हैं मगर रो रहे हैं हम आँखें कहीं, निगाह कहीं, दस्तो–पा कहीं किससे कहें कि ढूंढो बहुत खो रहे हैं हम हर सुबह फेंक जाती है बिस्तर पे कोई जिस्म यह कौन …
Read More »किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये – निदा फ़ाजली
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ नहीं उन चिरा.गों को हवाओं से बचाया जाये क्या हुआ शहर को कुछ भी तो नज़र आये कहीं यूँ किया जाये कभी खुद को रुलाया जाये बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं किसी तितली …
Read More »आ भी जा – निदा फाज़ली
आ भी जा, आ भी जा ऐ सुबह आ भी जा रात को कर विदा दिलरुबा आ भी जा मेरे, मेरे दिल के, पागलपन की और सीमा क्या है यूँ तो तू है मेरी, छाया तुझमें और तेरा क्या है मैं हूँ गगन, तू है ज़मीं, अधूरी सी मेरे बिना रात को कर विदा… देखूं चाहे जिसको, कुछ-कुछ तुझसा दिखता …
Read More »झर गये पात – बालकवि बैरागी
झर गये पात बिसर गई टहनी करुण कथा जग से क्या कहनी? नव कोंपल के आते–आते टूट गये सब के सब नाते राम करे इस नव पल्लव को पड़े नहीं यह पीड़ा सहनी झर गये पात बिसर गई टहनी करुण कथा जग से क्या कहनी? कहीं रंग है‚ कहीं राग है कहीं चंग है‚ कहीं फाग है और धूसरित पात …
Read More »ताला-चाबी – ओमप्रकाश बजाज
छोटे से छोटे से लेकर, खूब बड़े ताले आते है। मकान, दुकान, दफ्तर, फैक्टरी, बक्स गाडी में लगाए जाते है। ताला सुरक्षा का एक साधन है, सदियों से इसका प्रचलन है। अलीगढ़ के ताले प्रसिद्ध है, अब तो कई जगह बनते हैं। ताला अपनी चाबी से खुलता है, नंबरों वाला ताला भी आता है। चाबी सदा संभाल कर रखना, इधर-उधर …
Read More »कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता – निदा फ़ाज़ली
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता ये …
Read More »पिता सरीखे गांव – राजेंद्र गौतम
तुम भी कितने बदल गये हो पिता सरीखे गांव! परंपराओं का बरगद सा कटा हुआ यह तन बो देता है रोम रोम में बेचैनी सिहरन तभी तुम्हारी ओर उठे ये ठिठके रहते पांव। जिसकी वत्सलता में डूबे कभी सभी संत्रास पच्छिम वाले उस पोखर की सड़ती रहती लाश किसमें छोड़ें सपनों वाली काग़ज की यह नाव! इस नक्शे से मिटा …
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