बलतेज का जन्मदिन आ रहा था। इस बार ननिहाल से नानी जी, मामा जी और मामा जी का बेटा रंजन भी आ रहे थे। बलतेज अटकलें लगा रहा था, “बिंटी ज्योमैट्री बॉक्स लाएगी, हरीश चॉकलेट का डिब्बा, मनदीप सेल से बॉक्सिंग करने वाला बॉक्सर लाएगा और सोनू…?”
पिछले वर्ष भी दोस्तों से उसे जन्मदिन पर कीमती उपहार मिले थे – एक जोकर था, एक उड़ने वाली परी और एक…।
उपहार: डॉ. दर्शन सिंह ‘आशट’
एक दिन बलतेज के दोस्तों में उसके जन्मदिन की बात शुरू हुई तो पारस बोला, “मैंने बलतेज को पिछले साल महंगी एयरगन दी थी। उससे बलतेज ने कई चिड़ियों और कबूतरों का शिकार बनाया।”
होश बोला, “मैंने बड़ी ट्रेन दी थी। इतनी तेज दौड़ती थी कि…।”
“किसी भी स्टेशन पर नहीं रुकती थी,” निर्मल ने व्यंग्य किया। सब हंस पड़े।
सुंदर बोला, “और मेरे चॉकलेट के डिब्बे को वह कैसे भूल सकता है? पूरे दो सौ रुपए का आया था। उसने कहा था कि ऐसे चॉकलेट उसने पहले कभी नहीं खाए। वह कहता था कि चॉकलेट उसे सबसे ज्यादा पसंद हैं।”
दोस्तों में हंसी-ठिठोली की बातें चल ही रही थीं कि अगले पीरियड की घंटी बज गई।
सोनू भी बलतेज का दोस्त था। उसे पुस्तकों से बहुत प्रेम था। जब उसे समय मिलता, तो वह पुस्तकालय में आता और अपनी मनपसंद पुस्तकें पढ़ता रहता। पिछले सप्ताह उसने ‘गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का बाल साहित्य’ पुस्तक पढ़ी थी।
जब शनिवार का दिन आता, तो वह पुस्तकालय से कोई न कोई पुस्तक जारी करवा कर ले आता और आराम से पढ़ता रहता। इस तरह वह रविवार की छुट्टी के दौरान खाली समय का सदुपयोग कर लेता था।
एक दिन छुट्टी के पश्चात जब सोनू और बलतेज घर की ओर लौट रहे थे, तो बलतेज ने सोनू से पूछा, “मालूम है, अगले शनिवार क्या है?”
सोनू बोला, “तुम्हारे जन्मदिन के अलावा कुछ और हो तो बताओ!”
यह सुनकर बलतेज एकदम खुश हो गया। उसने बताया कि इस बार उसके ननिहाल से नानी जी के साथ मामाजी और उनका लड़का रंजन भी आ रहे हैं। रंजन उसके लिए एयरगन लेकर आएगा।
सोनू ने कहा, “यह तो देखना है कि दोस्त को कौन सा उपहार देना है। खिलौने ही सब कुछ नहीं होते।”
यह सुनकर बलतेज ने झट सवाल किया, “इसका मतलब खिलौनों का कोई महत्व नहीं होता?”
“मैंने यह कब कहा? ठीक है, बचपन में हमें खिलौने बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन कुछ खिलौने हानिकारक भी तो होते हैं, जिन्हें मैं बेकार की चीजें समझता हूं। कुछ एक दिन के बाद कबाड़ बन जाते हैं।”
“क्या मतलब? कौन से खिलौने हानिकारक होते हैं?”
“जैसे एयरगन। जानते हो, पिछले साल एयरगन चलाते समय गोली रानी की आंख में लगी थी तुमसे। ऐसे उपहार देने चाहिए जो मुश्किलों से जूझना सिखाएं और अच्छे साथी बनकर हमारा मार्गदर्शन भी करें।”
आखिर बलतेज का जन्मदिन भी आ गया। नानी जी, मामाजी और रंजन भी आ चुके थे। बलतेज, रंजन और उसकी दीदी ने मिलकर घर को गुब्बारों और कागज के फूलों से खूब सजाया हुआ था।
पापा बेकरी वाले से केक ले आए थे। अब बलतेज के सभी दोस्त भांति-भांति के उपहार ला रहे थे, जिनमें अधिकांश खिलौने ही थे। बलतेज बाग-बाग हो रहा था।
“चल भई बलतेज, अब केक काटो, पांच बज चुके हैं,” रंजन बोला।
ठीक उसी समय सोनू ने घर में प्रवेश किया। उसके हाथ में एक सुंदर पैकेट था। बलतेज को जन्मदिन की बधाई देते हुए सोनू ने मुस्कुराते हुए उसके हाथ में पैकेट थमा दिया।
“धन्यवाद सोनू! ये…?” बलतेज की बात अभी अधूरी ही थी कि सोनू एकदम बोल पड़ा, “हां, बाल साहित्य की इन अच्छी पुस्तकों के अलावा मुझे कोई और उपहार नहीं मिला।”
“वाह! अब मुझे उस दिन वाली बात समझ में आ गई है।”
बलतेज ने केक पर छुरी चलाई। तालियों की गड़गड़ाहट में “जन्मदिन मुबारक” की मिली-जुली आवाजें गूंजने लगीं। मेज पर सोनू का गिफ्ट पैक अलग ही नजर आ रहा था।
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