रोहन और राधा को गर्मी की छुट्टियों का इंतजार रहता था क्योंकि दोनों हर बार छुट्टियों में अपने नाना-नानी के गांव ‘सुन्दरपुर‘ जाते थे। गांव जाने का समय होता तो वे गाने लगते, “नाना के घर जाएंगे, दूध-मलाई खाएंगे, मोटे हो कर आएंगे।”
सुंदरपुर में जो कुछ रोहन और राधा को मिलता था, वह कभी उनको अपने शहर जयपुर में नहीं मिला। गांव का वातावरण और वहां का खूबसूरत तालाब, जो चारों ओर से रंग-बिरंगे फूलों से घिरा रहता है, जिसमें सफेद सुंदर बतखें तैरती हैं।
आम का पेड़: प्रभा पारीक
तालाब के ही पास लगा बड़ा-सा आम का सदाबहार पेड़ नाना-नानी की तरह दिल खोल कर स्वागत व प्यार देने को तैयार रहता और हर गर्मी की छुट्टी उनका खेलने, खाने और मस्ती करने का स्थान बन जाता।
दोनों उसकी छाया में खेलते, कहानियां सुनते और हर साल उसका जन्मदिन भी मनाते थे। उस दिन वे अपने दोस्तों और परिवार के लोगों को बुलाते, पेड़ को सजाते और खूब आनंद मनाते।
इस बार दोनों ने मिलकर सोचा कि वे आम के पेड़ के जन्मदिन पर उसे सजाने के लिए तरह-तरह के रिबन व चमकीले रंग-बिरंगे कागज लेकर जाएंगे ताकि लहलहाता, पीले मीठे आमों से लदा ‘आम का पेड़‘ अपने जन्मदिन पर खूब सुंदर लगे, गांव के आकर्षण का केंद्र बने।
जब दोनों अपने मम्मी-पापा के साथ नानाजी के गांव पहुंचे तो सबसे पहले रोहन ने अपने प्यारे पेड़ के बारे में पूछा, “नानाजी क्या हमारा पेड़ बिल्कुल ठीक है?”
राधा बोली, “रोहन भैया नानाजी से क्या पूछते हो, चलो हम तालाब के किनारे अपने सभी दोस्तों से मिलकर आते हैं।”
फिर क्या था, दोनों भाई-बहन झट से तालाब के किनारे जाने के लिए दौड़ लगाने लगे। उनके नानाजी उन्हें बुलाते रहे पर उनको तो बस अपने आम के पेड़ से मिलने की जल्दी थी।
वे जैसे ही तालाब के किनारे पहुंचे उन्होंने देखा कि तालाब का पानी बहुत गंदा हो गया है अब तो उसमें बतखें भी नहीं तैर रही थीं, आसपास रंग-बिरंगे फूल भी मुरझा गए थे, साथ ही साथ उनका प्यारा आम का पेड़ भी अपनी जगह से गायब था।
वे सोचने लगे, “अरे! हमारा प्यारा पेड़ कहां गया और यह सुंदर तालाब किसने गंदा किया?” दोनों का चेहरा उतर गया था, रोहन राधा से बोला, “कहीं किसी ने पेड़ को काट तो नहीं दिया न!”
दोनों घर जाने की सोच ही रहे थे कि उन्हें सामने से नानाजी आते दिखाई दिए, नानाजी दोनों बच्चों की उदासी का कारण जानते थे। उन्होंने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया और बताया कि आजकल शहरों से बहुत से लोग छुट्टियां मनाने यहां आते हैं। वे अपने साथ थैलियों में बंद की हुई कई सारी खाने-पीने की चीजें भी लाते हैं और जब वापस जाते हैं तो सारा कचरा इस सुंदर तालाब में फेंक जाते हैं।
ये जो रंग-बिरंगी थैलियां तुम्हें पानी के ऊपर दिखाई दे रही हैं, ये सब उन लोगों के ही कारण हैं इसलिए अब तालाब पर कोई जानवर भी नहीं आते और सारे फूल भी मुरझा गए हैं। कुछ दिन पहले कुछ लोग आए और कई सारे पेड़ काट कर ले गए जिसमें तुम्हारा प्यारा आम का पेड़ भी था।
“आपने उन्हें रोका नहीं नानाजी … “?
रोहन ने पूछा तो मायूस नानाजी ने कहा, “वे सरकारी आदेश लाए थे, मैं कैसे रोक सकता था।”
राधा और रोहन बहुत दुखी हुए। तभी रोहन बोला, “चलो! राधा, हम एक नया आम का पेड़ लगाते हैं और अपने दोस्तों को बुलाकर लाते हैं। हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से क्या होगा। हमें कुछ तो करना होगा ताकि हम अपने तालाब के आसपास की गंदगी को साफ कर सकें। हम इस जगह को पहले जैसा सुंदर बना देंगे।”
अगले दिन रोहन व राधा ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर तालाब के आसपास के कचरे को साफ किया, नए आम के पेड़ के लिए आम की गुठली जमीन में दबा दी।
उस दिन सभी ने मिलकर आम के पेड़ का पहला जन्मदिन भी मनाया। दोनों जो रिबन व रंग-बिरंगे कागज जयपुर से लाए थे, उनसे तालाब के आसपास के पेड़-पौधों को सजाया और मिलकर वादा किया कि वे सदा अपने आसपास साफ सफाई रखेंगे। रोहन ने तालाब के किनारे अपने नानाजी से लिखवाया – ‘कृपया कचरा तालाब में न डालें व पेड़ न काटें‘।
दोनों बहन-भाई यह सोचकर खुश थे कि वह दिन भी जल्दी आएगा जब उनका लगाया आम का पेड़ बड़ा हो जाएगा और वे उससे गले मिल सकेंगे।
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