अप्रैल फूल के अवसर पर शिक्षाप्रद बाल-कहानी

अप्रैल फूल के अवसर पर शिक्षाप्रद बाल-कहानी

चारों तरफ फ़ुसफ़ुसाहट हो रही थी। सभी बच्चे एक दूसरे को देखकर ऊपर से तो मुस्कुरा रहे थे पर मन ही मन एक दूसरे को अप्रैल फूल बनाने के लिए सोच रहे थे।

ऐसा लग रहा था कि कक्षा में बहुत सारी मधुमक्खियाँ भिनभिना रही थी।

तभी एक हाथ में रजिस्टर पकड़े हुए जोशी मैडम कक्षा में आई। उनके आते ही कक्षा में सन्नाटा छा गया। रोहित धीरे से बोला – “मजा तो तब है जब हम मैडम को अप्रैल फूल बनाये”।

उसकी बात सुनते ही घबराहट के मारे अमोल को ठसका लग गया और वह जोरों से खाँसने लगा।

जोशी मैडम का ध्यान अमोल की ओर गया और वह तुरंत अमोल के पास चली गई।

“जल्दी से पानी की बोतल दो” उन्होंने रोहित से कहा और अमोल की पीठ पर हाथ फेरने लगी।

रोहित ने बोतल का ढक्कन खोलकर अमोल को बोतल पकड़ा दी।

तीन चार घूँट पानी पीकर अमोल ने चैन की साँस ली।

“क्या हो गया था अचानक” जोशी मैडम ने पूछा?

अप्रैल फूल: डॉ. मंजरी शुक्ला

अमोल कुछ कहता इससे पहले ही पीछे की सीट से मीना की आवाज़ आई – “रोहित और अमोल आपको अप्रैल फूल बनाने की बात कर रहे थे”।

जोशी मैडम मीना की बात सुनकर हँस दी और वहाँ से चल दी।

और अमोल ने गुस्से से मीना की ओर देखा पर उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ा और वह उन्हें देखकर मुँह चिढ़ाने लगी।

उधर जोशी मैडम बच्चों को पढ़ा तो रही थी पर उनका ध्यान “अप्रैल फूल” वाली बात पर ही लगा था।

स्कूल की छुट्टी होने के बाद जब जोशी मैडम स्कूल से निकल रही थी तो अमोल उनके पास आकर बोला – “मैडम, रोहित ने मजाक किया था। हम सब बच्चें आपस में एक दूसरे को अप्रैल फूल बनाने की बात कर रहे थे”।

मैडम ने अमोल को गौर से देखा।

अमोल का चेहरा धूप में दौड़ने के कारण लाल हो रहा था और वह बार बार स्कूल के गेट की तरफ़ देख रहा था।

“वो तो रोहित है ना!” मैडम ने अपना चश्मा पहनते हुए कहा।

“हाँ, वो आपका और उसका घर अगल बगल में है ना, इसलिए वह बहुत डर रहा है कि कहीं आप उसकी शिकायत उसके पापा से ना कर दे”।

“अरे, वो बात तो मैं भूल ही गई हूँ” कहते हुए जोशी मैडम हँस दी।

यह सुनकर अमोल का चेहरा खिल उठा और वह भागते हुए रोहित के पास जा पहुँचा।

पर जोशी मैडम को अब पूरा भरोसा हो गया था कि रोहित उन्हें “अप्रैल फूल” जरूर बनाएगा इसलिए उन्होंने सोच लिया कि वह अगले तीन दिन तक रोहित की किसी बात पर भी भरोसा नहीं करेंगी।

अगले दिन स्कूल में जब रोहित ने उन्हें देखकर नमस्ते किया तो उन्होंने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया और स्टाफ़ रूम की तरफ़ चली गई।

दो दिन और बीत गए और 1 अप्रैल आ गया। जोशी मैडम बार बार रोहित के बारे में ही सोच रही थी पर जब क्लास में जाकर उन्हें पता चला कि रोहित स्कूल नहीं आया है तो उन्होंने चैन की साँस ली।

पीरियड खत्म होने के बाद जब वह क्लास से बाहर निकली तो उन्होंने रोहित को खड़ा देखा।

वह बहुत परेशान सा लग रहा था।

“क्या हो गया” मैडम ने मुस्कुराते हुए पूछा?

“मैडम, मुझे कल रात से बहुत तेज बुखार है इसलिए आज मैं स्कूल भी नहीं आया। पर आपके पापा आये हुए है और उन्होंने मुझे आपसे घर की चाभी लाने के लिए भेजा है”।

जोशी मैडम सब समझ गई और मुस्कुराते हुए बोली – “तो तुम्हारे पापा क्यों नहीं आये”?

“वह तो ऑफ़िस गए हुए है” रोहित ने दरवाज़ा पकड़ते हुए कहा।

“रोहित तो बहुत ही पुराना बहाना बना रहा है। मेरे पापा आज तक मुझे बिना बताये हुए कभी नहीं आए” जोशी मैडम ये सोचकर मन ही मन हँसी।

“मैडम, मुझे बहुत तेज बुखार है और रास्ते में कोई ऑटो नहीं मिलने के कारण मैं पैदल ही चला आ रहा हूँ। अगर आप प्रिंसिपल सर से कह देंगी तो वह मुझे किसी गाड़ी से भिजवा देंगे” रोहित धीरे से बोला।

जोशी मैडम का पारा सातवेँ आसमान पर जा पहुँचा।

उन्होंने सोचा, एक तो मुझे पापा के आने की झूठी खबर दे रहा है और ऊपर से मुझे अप्रैल फूल बनाने के बाद आराम से गाड़ी में घूमते हुए घर भी जाना है।

उन्होंने गुस्से से रोहित को घूरा और अगली क्लास लेने चली गई।

सारा दिन उन्हें रह रहकर रोहित पर गुस्सा आता रहा। उन्होंने अपने मन में निश्चय कर लिया कि वह प्रिंसिपल सर से रोहित की शिकायत जरूर करेंगी ताकि आगे से कोई बच्चा इस तरह से अपने टीचर को बेवकूफ़ बनाने की ना सोचे।

स्कूल खत्म होने के बाद भी उनका गुस्सा खत्म नहीं हो रहा था। इसलिए अपने घर के बजाय वह सीधे रोहित के घर जा पहुँची। तीन चार घंटी बजने के बाद भी जब दरवाज़ा नहीं खुला तो वह समझ गई कि रोहित उनके डर से दरवाज़ा नहीं खोल रहा है।

उनका चेहरा गुस्से से तमतमा गया। वह वापस जाने को जैसे ही मुड़ी, उन्हें दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

वह तुरंत पलटी पर दरवाज़े का दृश्य देखकर वह सन्न रह गई।

सामने ही उनके पापा खड़े हुए थे।

“पापा, आप” जोशी मैडम ने आश्चर्य से कहा!

“कल से तुम्हारा फोन लगा रहा हूँ पर तुम उठा ही नहीं रही”।

जोशी मैडम ने हड़बड़ाकर अपना मोबाइल पर्स से निकाला तो उसमें बहुत सारी मिस्ड कॉल पड़ी हुई थी। अप्रैल फूल के चक्कर में वह इतना परेशान हो गई थी कि मोबाइल साइलेंट मोड पर रखकर भूल गई थी।

जोशी मैडम सकपकाते हुए बोली – “तो क्या रोहित को आपने भेजा था”।

“हाँ, पर मुझे पता नहीं था कि उसको बुखार है। बेचारा एक किलोमीटर पैदल चलकर गया था तुम्हें बुलाने के लिए और जब तुम स्कूल में नहीं मिली तो फिर एक किलोमीटर पैदल चलकर वापस आया”।

पापा दुखी होते हुए बोले।

जोशी मैडम की आँखें भर आई।

उनके मान सम्मान पर आँच ना आए इसलिए रोहित ने ये तक नहीं बताया कि वह स्कूल में उनसे मिला था।

जोशी मैडम ने आँसूं पोंछते हुए पूछा – “रोहित कहाँ है”?

“वह उस कमरे में आराम कर रहा है” पापा ने एक कमरे की ओर इशारा करते हुए कहा।

जोशी मैडम कमरे की ओर बढ़ी। सामने ही पलंग पर रोहित लेटा हुआ था।

रोहित का उदास और पीला चेहरा देखकर जोशी मैडम की आँखें डबडबा उठी। उन्होंने रोहित के सिर पर हाथ फेरते हुए प्यार से उसका माथा चूम लिया।

रोहित मुस्कुराते हुए धीरे से बोला – “अप्रैल फूल तो रह ही गया”।

“अगले साल ज़रूर बनाना” कहते हुए जोशी मैडम रोहित का हाथ पकड़कर रो पड़ी।

~ ‘अप्रैल फूल’ story by डॉ. मंजरी शुक्ला

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