आत्मनिर्भर: अपने काम खुद करने की आदत और जीवन में आत्मनिर्भरता की प्रेरक बाल कहानी

आत्मनिर्भर: अपने काम खुद करने की आदत और जीवन में आत्मनिर्भरता की प्रेरक बाल कहानी

रावी नदी के किनारे एक बहुत बड़ा वट वृक्ष था। उस पर बहुत सारे पक्षी रहते थे। वट वृक्ष पर मीनू चिड़िया अपने दो बच्चों चुन्नू मुन्नू के साथ रहती थी।

चुन्नू बड़ा तथा मुन्नू छोटा था। मुन्नू के छोटा होने के कारण उसकी अम्मा उसे ज्यादा लाड़-प्यार करती थी। इस वजह से मुन्नू की आदत बिगड़ चुकी थी। वह पक्का आलसी बन गया था।

आत्मनिर्भर: अमर सिंह शौल

मुन्नू के दूसरे साथी तथा चुन्नू अपने लिए खुद भोजन की तलाश करते थे जबकि मुन्नू भोजन के मामले में अपनी अम्मा पर ही निर्भर रहता था।

मीनू ने कई बार उसे समझाते हुए कहा, “अब तुम बड़े हो गए हो। अपने लिए खुद भोजन ढूंढा करो।”

“अम्मा मैं अभी बहुत छोटा हूं। मैं कैसे भोजन ढूंढ पाऊंगा?” मुन्नू बहाना बना देता।

“ज्यादा बहाने मत बनाया करो। देखो तुम्हारे सभी साथी अपने लिए खुद भोजन तलाशते हैं। एक तुम हो जो बेवजह ही आलसी बन रहे हो।”

मुन्नू ने अम्मा की बातों को एक कान से सुना-दूसरे कान से निकाल दिया। मीनू रात-दिन यही सोचती रहती कि इस आराम-परसती मुन्नू को कैसे सुधारा जाए।

“बहन, मैं अपने आलसी मुन्नू से तंग आ चुकी हूं। इसे कैसे रास्ते पर लाया जाए? इतना बड़ा हो गया है। अभी तक भोजन के लिए मेरा मुंह ताकता रहता है।” मीनू अपनी पड़ोसन रिंकी चिड़िया से बोली।

“हां बहन, तुम ठीक कहती हो, मुन्नू बड़ा हो गया है। उसे खुद ही अपना भोजन तलाशना चाहिए।” रिंकी ने कहा।

“मैं समझाते-समझाते थक चुकी हूं। अब तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?”

“तुम एक दिन काम का बहाना बनाकर सुबह से ही दूर निकल जाना।” रिंकी ने उसे अपनी योजना समझाते हुए कहा, “बाकी मैं देख लूंगी।”

मीनू ने वैसा ही किया। सुबह से दोपहर होने को आई मुन्नू अपनी अम्मा के इंतजार में बैठा रहा। भूख के मारे उसके पेट में चूहे कूद रहे थे। मां का इंतजार करते-करते शाम होने को आ गई। मुन्नू की भूख के मारे हालत खराब हो रही थी।

उसे अपनी अम्मा पर बहुत गुस्सा आ रहा था। जब उसे कोई नहीं दिखाई दिया तो वह रिंकी चिड़िया के पास गया।

“मौसी, अम्मा न जाने सुबह से कहां चली गई। मुझे जोर की भूख लगी हुई है। कुछ खाने को दो।”

“तुम्हें शर्म नहीं आती इतने बड़े होकर दूसरों के आगे हाथ फैलाते हो।” रिंकी ने उसे डांटते हुए कहा, “जाओ अपना भोजन खुद ढूंढो। मां के सिरहाने कब तक बैठे रहोगे।”

मुन्नू कुछ नहीं बोला। चुपचाप वहां से निकल गया। थोड़ी देर में उसे अपने साथी दिखाई दिए। वे छोटे-छोटे कीड़े-मकौड़ों को अपना शिकार बना रहे थे। मुन्नू ने उन्हें देख कर वैसा ही किया।

आत्मनिर्भर: अपने काम खुद करने की आदत और जीवन में आत्मनिर्भरता की प्रेरक बाल कहानी
आत्मनिर्भर: अपने काम खुद करने की आदत और जीवन में आत्मनिर्भरता की प्रेरक बाल कहानी

मीनू ने जब उसे ऐसा करते देखा तो वह मन ही मन प्रसन्न हो रही थी। वह बिना कुछ कहे चुपचाप वृक्ष की ओर चली गई।

मुन्नू जब लौट कर आया तो अपनी अम्मा से बोला, “अम्मा तुम सुबह से कहां चली गई थी। मेरा भूख के मारे बहुत बुरा हाल हो रहा था। रिंकी मौसी ने भी खाना देने से इंकार कर दिया। आज मैंने खुद ही अपने लिए भोजन ढूंढ लिया।”

“शाबाश, मेरे बेटे आज तुमने बहुत अच्छा काम किया है।” मीनू ने उसके सिर पर प्यार से पंजा फेरते हुए कहा, “मैं भी यही चाहती थी कि तुम दूसरों के ऊपर आश्रित होने के बजाय खुद आत्मनिर्भर बनो।”

आलसी मुन्नू सुधर चुका था। मीनू उसके ऊपर खुश थी।

~ अमर सिंह शौल, मंडी (हिमाचल प्रदेश)

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