ग्राउंड पर उतरते असली ईको-वारियर्स: पेडों की पाठशाला
दिल्ली के एक पार्क से तैयार हो रहे हैं नए पर्यावरण योद्धा: दंपती रोहित मेहरा और गीतांजलि का अनूठा प्रयास
रविवार की सुबह है। दिल्ली के वेस्ट किदवई नगर का एक पार्क बच्चों की खिलखिलाहट से जीवंत हो उठा है। कुछ बच्चे पेड़ों की छाल को हाथों से टटोल रहे हैं, कुछ पत्तियों की आकृतियां अपनी कॉपी में उतार रहे हैं तो कुछ मिट्टी में बीज दबाकर यह कल्पना कर रहे हैं कि कुछ वर्षों बाद यही बीज विशाल वृक्ष बनकर अनगिनत लोगों को छाया देंगे। किसी के हाथ में मोबाइल नहीं है, किसी की निगाह स्क्रीन पर नहीं टिकी है। आज उनकी दुनिया प्रकृति है, और प्रकृति ही उनकी शिक्षक।
यह है ‘पेड़ों की पाठशाला’ वाला पार्क। न विद्यालय, न क्लासरूम, न किताबों का बोझ और न ही कोई फीस। यहां पेड़ शिक्षक हैं, मिट्टी प्रयोगशाला है, पत्तियां पाठ्यपुस्तक हैं और जिज्ञासा सबसे बड़ा पाठ्यक्रम। हैं और जिज्ञासा सबसे बड़ा पाठ्यक्रम।
आयकर विभाग के अधिकारी रोहित मेहरा आईआरएस और उनकी पत्नी गीतांजलि मेहरा ने इसकी शुरुआत की है। आधुनिक शिक्षा ने बच्चों को सूचना तो दी है, लेकिन प्रकृति से उनका रिश्ता धीरे-धीरे कमजोर कर दिया है। उन्हें पेड़ों की पहचान नहीं है। इसी दूरी को
मिटाने के लिए उन्होंने पार्क को ही विद्यालय बना दिया। यहां शिक्षा का तरीका अलग है। लगभग 75 प्रतिशत अनुभव और 25 प्रतिशत
सिद्धांत के माध्यम से सीखना होता है यहां। बच्चे केवल यह नहीं पढ़ते कि पेड़ों में जल कैसे ऊपर तक पहुंचता है, बल्कि स्वयं तनों
को छूकर, पत्तियों को देखकर और प्रयोगों के माध्यम से इसे समझते हैं। वे जानते हैं कि पत्तियां सूर्य की ओर क्यों मुड़ती हैं, पेड़ अपनी
चोटों को कैसे भरते हैं, केंचुए मिट्टी के डॉक्टर क्यों कहलाते हैं और एक स्वस्थ मिट्टी पूरी पृथ्वी के स्वास्थ्य का आधार क्यों है। दिल्ली
के इस छोटे-से पार्क में बच्चे केवल पर्यावरण पर बोलना नहीं सीख रहे, बल्कि पेड़ों की सेवा करना, बीज बचाना, जैव विविधता को
समझना और धरती के प्रति जिम्मेदारी निभाना सीख रहे हैं। यही कारण है कि दिल्ली के अनेक प्रतिष्ठित विद्यालयों के विद्यार्थी भी
सप्ताहांत में यहां पहुंचते हैं।
यहां बच्चों को प्रश्न पूछना सिखाया जाता है। यदि किसी बच्चे के मन में यह जिज्ञासा उठती है कि बरगद की जड़ें हवा में क्यों लटकती हैं, या चींटियां हमेशा एक ही पेड़ पर क्यों दिखाई देती हैं, तो उत्तर खोजने की यात्रा वहीं से शुरू होती है। यही जिज्ञासा आगे चलकर वैज्ञानिक सोच, पर्यावरणीय चेतना और जीवनभर सीखते रहने की आदत में बदल जाती है। आज जब बच्चों का बचपन मोबाइल स्क्रीन और बंद कमरों में सिमटता जा रहा है, तब दिल्ली के एक छोटे-से पार्क से उठी यह पहल पूरे देश के लिए एक संदेश बन गई है। यदि हर कॉलोनी का पार्क बच्चों की कक्षा बन जाए, हर पेड़ उनका शिक्षक बन जाए और हर सप्ताह कुछ घंटे प्रकृति के नाम समर्पित कर दिए जाएँ, तो पर्यावरण संरक्षण किसी सरकारी योजना का विषय नहीं रहेगा, बल्कि समाज का स्वाभाविक संस्कार बन जाएगा।
आज इस पाठशाला में आने वाले बच्चे शायद भविष्य के वैज्ञानिक, प्रशासक, शिक्षक या उद्यमी बनें। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे ऐसे नागरिक बनेंगे जिन्हें यह याद रहेगा कि पृथ्वी केवल विरासत नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी के लिए हमारी जिम्मेदारी भी है। शायद इसलिए पेड़ों की पाठशाला केवल एक पहल नहीं, बल्कि एक विचार है-ऐसा विचार जो बताता है कि प्रकृति से जुड़ा बचपन ही सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत नींव है। आने वाले भारत को केवल तकनीक में दक्ष युवाओं की नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील नागरिकों की आवश्यकता है जो पेड़ों को संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार समझें। क्योंकि धरती को बचाने के लिए केवल पर्यावरण की बातें
करने वाले नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ जीने वाले बच्चों की जरूरत है।
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