तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना, याद करेगी दुनिया, तेरा मेरा अफसाना… मेरी ज़िन्दगी सवारी, मुझको गले लगाके, बैठा दिया फलक पे, मुझे खात से उठाके… यारा तेरी यारी को मैने तो खुदा मन याद करेगी दुनिया तेरा मेरा अफसाना मेरे दिल की यह दुआ है कभी दूर तू न जाए तेरे बिना हो जीना वोह दिन कभी न …
Read More »बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा: आनंद बक्षी
रफ़ी: बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा सलामत रहे दोस्ताना हमारा किशोर: बने चाहे … रफ़ी: वो ख़्वाबों के दिन वो किताबों के दिन सवालों की रातें जवाबों के दिन कई साल हमने गुज़ारे यहाँ यहीं साथ खेले हुए हम जवां हुए हम जवां था बचपन बड़ा आशिकाना हमारा सलामत रहे दोस्ताना हमारा किशोर: बने चाहे … किशोर: ना बिछड़ेंगे मर …
Read More »Poem written in thankfulness to a great sister: My Sister, My Friend
To me you are an angel in disguise. Full of intuition, you are intelligent and wise. Always giving and helping through Good times and bad. You are the best friend I’ve ever had. If I had one wish, it would surely be To give you as much as you’ve given to me. Though I’ve put our relationship through some cloudy …
Read More »You Are Not Still The One: Poem about relationship – When Your Best Friend Is Not Your Lover
I’ve been watching you For a long period As you always have been So nice to me But Baby! What I can’t say Even I can’t tell Perhaps you may not think That you have never been the girl Who I may like Baby, you have never been my choice Even how can I say it to you You always …
Read More »चले नहीं जाना बालम – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
यह डूबी डूबी सांझ उदासी का आलम‚ मैं बहुत अनमनी चले नहीं जाना बालम! ड्योढ़ी पर पहले दीप जलाने दो मुझ को‚ तुलसी जी की आरती सजाने दो मुझ को‚ मंदिर में घण्टे‚ शंख और घड़ियाल बजे‚ पूजा की सांझ संझौती गाने दो मुझको‚ उगने तो दो उत्तर में पहले ध्रुव तारा‚ पथ के पीपल पर आने तो दो उजियारा‚ …
Read More »अगर कहीं मैं घोड़ा होता – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
अगर कहीं मैं घोड़ा होता वह भी लंबा चौड़ा होता तुम्हें पीठ पर बैठा कर के बहुत तेज मैं दौड़ा होता पलक झपकते ही ले जाता दूर पहाड़ी की वादी में बातें करता हुआ हवा से बियाबान में आबादी में किसी झोपड़े के आगे रुक तुम्हें छाछ और दूध पिलाता तरह तरह के भोले भोले इंसानों से तुम्हें मिलाता उनके …
Read More »नए साल की शुभकामनाएं – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पांव को कुहरे में लिपटे उस छोटे से गांव को नए साल की शुभकामनाएं। जांते के गीतों को बैलों की चाल को करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को नए साल की शुभकामनाएं। इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को नए साल की शुभकामनाएं। …
Read More »माँ की याद – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
चींटियाँ अण्डे उठाकर जा रही हैं, और चिड़ियाँ नीड़ को चारा दबाए, धान पर बछड़ा रंभाने लग गया है, टकटकी सूने विजन पथ पर लगाए, थाम आँचल, थका बालक रो उठा है, है खड़ी माँ शीश का गट्ठर गिराए, बाँह दो चमकारती–सी बढ़ रही है, साँझ से कह दो बुझे दीपक जलाये। शोर डैनों में छिपाने के लिए अब, शोर …
Read More »कितनी बड़ी विवशता – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
कितना चौड़ा पाट नदी का, कितनी भारी शाम, कितने खोए–खोए से हम, कितना तट निष्काम, कितनी बहकी–बहकी सी दूरागत–वंशी–टेर, कितनी टूटी–टूटी सी नभ पर विहगों की फेर, कितनी सहमी–सहमी–सी जल पर तट–तरु–अभिलाषा, कितनी चुप–चुप गयी रोशनी, छिप छिप आई रात, कितनी सिहर–सिहर कर अधरों से फूटी दो बात, चार नयन मुस्काए, खोए, भीगे, फिर पथराए, कितनी बड़ी विवशता, जीवन की, …
Read More »कच्ची सड़क – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
सुनो ! सुनो ! यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी जो मेरे गाँव को जाती थी। नीम की निबोलियाँ उछालती, आम के टिकोरे झोरती, महुआ, इमली और जामुन बीनती जो तेरी इस पक्की सड़क पर घरघराती मोटरों और ट्रकों को अँगूठा दिखाती थी, उलझे धूल भरे केश खोले तेज धार सरपत की कतारों के बीच घूमती थी, कतराती थी, खिलखिलाती …
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