Poems For Kids

Poetry for children: Our large assortment of poems for children include evergreen classics as well as new poems on a variety of themes. You will find original juvenile poetry about trees, animals, parties, school, friendship and many more subjects. We have short poems, long poems, funny poems, inspirational poems, poems about environment, poems you can recite

मेरी थकन उतर जाती है: रामावतार त्यागी

मेरी थकन उतर जाती है: रामावतार त्यागी

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से मैंने अक्सर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है। कोई ठोकर लगी अचानक जब-जब चला सावधानी से, पर बेहोशी में मंजिल तक जा पहुँचा हूँ आसानी से; रोने वाले के अधरों पर अपनी मुरली धर देने से मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है। प्यासे अधरों …

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जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी: रामावतार त्यागी

जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी: रामावतार त्यागी

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ; मत बुझाओ! जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी… पाँव तो मेरे थकन ने छील डाले अब विचारों के सहारे चल रहा हूँ, आँसूओं से जन्म दे-देकर हँसी को एक मंदिर के दिए-सा जल रहा हूँ; मैं जहाँ धर दूँ कदम वह राजपथ है, मत मिटाओ! पाँव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी… बेबसी मेरे अधर …

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इंकार कर दिया: रामावतार त्यागी

इंकार कर दिया: रामावतार त्यागी

मेरे पीछे इसीलिये तो धोकर हाथ पड़ी है दुनिया मैंने किसी नुमाइश घर में सजने से इन्कार कर दिया। विनती करती, हुक्म चलाती रोती, फिर हँसती, फिर गाती; दुनिया मुझ भोले को छलने, क्या–क्या रूप बदल कर आती; मंदिर ने बस इसीलिये तो मेरी पूजा ठुकरा दी है, मैंने सिंहासन के हाथों पुजने से इन्कार कर दिया। चाहा मन की …

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गाँव जाना चाहता हूँ: रामावतार त्यागी

गाँव जाना चाहता हूँ: रामावतार त्यागी

ओ शहर की भीड़ अब मुझको क्षमा दो लौट कर मैं गाँव जाना चाहता हूँ। तू बहुत सुंदर बहुत मोहक कि अब तुझसे घृणा होने लगी है अनगिनत तन–सुख भरे हैं शक नहीं है किंतु मेरी आत्मा रोने लगी है गाँव की वह धूल जो भूली नहीं है फिर उसे माथे लगाना चाहता हूँ। कीमती पकवान मेवे सब यहाँ हैं …

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गाली अगर न मिलती: रामावतार त्यागी

गाली अगर न मिलती: रामावतार त्यागी

गाली अगर न मिलती तो फिर मुझको इतना नाम न मिलता, इस घायल महफिल में तुमको सुबह न मिलता शाम न मिलता। मैं तो अपने बचपन में ही इन महलों से रूठ गया, मैंने मन का हुक्म न टाला चाहे जितना टूट गया, रोटी से ज्यादा अपनी आजादी को सम्मान दिया, ऐसी बात नहीं है मुझको कोई घटिया काम न …

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तुझे कैसे भूल जाऊं: दुष्यंत कुमार

तुझे कैसे भूल जाऊं: दुष्यंत कुमार

अब उम्र की ढलान उतरते हुए मुझे आती है तेरी याद‚ तुझे कैसे भूल जाऊं। गहरा गये हैं खूब धुंधलके निगाह में गो राहरौ नहीं हैं कहीं‚ फिर भी राह में – लगते हैं चंद साए उभरते हुए मुझे आती है तेरी याद‚ तुझे कैसे भूल जाऊं। फैले हुए सवाल सा‚ सड़कों का जाल है‚ ये सड़क है उजाड़‚ या …

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इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है: दुष्यंत कुमार

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है: दुष्यंत कुमार

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है, नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है। एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों, इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है। एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी, आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है। एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल …

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सूना घर: दुष्यंत कुमार

सूना घर: दुष्यंत कुमार

सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को। पहले तो लगा कि अब आईं तुम, आकर अब हँसी की लहरें काँपी दीवारों पर खिड़कियाँ खुलीं अब लिये किसी आनन को। पर कोई आया गया न कोई बोला खुद मैंने ही घर का दरवाजा खोला आदतवश आवाजें दीं सूनेपन को। फिर घर की खामोशी भर आई मन में चूड़ियाँ खनकती नहीं …

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मत कहो, आकाश में कोहरा घना है: दुष्यंत कुमार

मत कहो, आकाश में कोहरा घना है: दुष्यंत कुमार

मत कहो, आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से, क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है। इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है, हर किसी का पाँँव घुटनों तक सना है। पक्ष औ’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है। रक्त वर्षों …

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कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये: दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये: दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये, कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये। यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये। न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये। ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही, …

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