एक सीढ़ी और: कुंवर बेचैन

एक सीढ़ी और: कुंवर बेचैन

एक सीढ़ी और चढ़ आया
समय इस साल
जाने छत कहाँ है।

प्राण तो हैं प्राण
जिनको देह–धनु से छूटना है,
जिंदगी – उपवास
जिसको शाम के क्षण टूटना है,
हम समय के हाथ से
छूटे हुए रूमाल,
जाने छत कहाँ है।

यह सुबह, यह शाम
बुझते दीपकों की व्यस्त आदत
और वे दिन–रात
कोने से फटे जख्मी हुए ख़त
यह हथेली भी हुई है
मकड़ियों का जाल
जाने छत कहाँ है।

कुंवर बेचैन

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