कोयलों ने क्यों पसंद किया हमारा ही पेड़? बुलबुलें हर मौसम में क्यों इसी पर बैठी रहती हैं? क्यों गौरैयों के बच्चे हो रहे हैं बेशुमार? क्यों गिलहरी को इसपर से उतरकर छत पर चक्कर काटना अच्छा लगता है? क्यों गिरगिट सोया रहता है यहाँ? शायद इन मुफ्त के किराएदारों को हमारा पड़ोस अच्छा लगता है वे देखते होंगे कि …
Read More »जिंदगी – बुद्धिनाथ मिश्रा
जिंदगी अभिशाप भी, वरदान भी जिंदगी दुख में पला अरमान भी क़र्ज साँसों का चुकाती जा रही जिंदगी है मौत पर अहसान भी। वे जिन्हें सर पर उठाया वक्त ने भावना की अनसुनी आवाज थे बादलों में घर बसाने के लिये चंद तिनके ले उड़े परवाज थे दब गये इतिहास के पन्नों तले तितलियों के पंख, नन्ही जान भी। कौन …
Read More »निदा फ़ाज़ली के दोहे
युग युग से हर बाग का, ये ही एक उसूल जिसको हँसना आ गया, वो ही मट्टी फूल। पंछी, मानव, फूल, जल, अलग–अलग आकार माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार। बच्चा बोला देख कर, मस्जिद आलीशान अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान। अन्दर मूरत पर चढ़े घी, पूरी, मिष्टान मंदिर के बाहर खड़ा, ईश्वर माँगे दान। आँगन–आँगन बेटियाँ, …
Read More »पुराने पत्र – रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’
हर पुराना पत्र सौ–सौ यादगारों का पिटारा खोलता है। मीत कोई दूर का, बिछड़ा हुआ सा, पास आता है, लिपटता, बोलता है। कान में कुछ फुसफुसाता है, हृदय का भेद कोई खोलता है। हर पुरान पत्र है इतिहास आँसू या हँसी का चाँदनी की झिलमिलाहट या अन्धेरे की घड़ी का आस का, विश्वास का, या आदमी की बेबसी का। ये …
Read More »नखरे सलाई के – दिनेश प्रभात
आ गये दिन लौट कर, कंबल रज़ाई के। सज गये दूकान पर फिर ऊन के गोले, पत्नियों के हाथ में टंगने लगे झोले, देखने लायक हुए नखरे सलाई के। धूप पाकर यूं लगा, ज्यों मिल गई नानी, और पापा–सा लगा, प्रिय गुनगुना पानी, हो गये चूल्हे, कटोरे रसमलाई के। ले लिया बैराग मलमल और खादी ने, डांट की चाबुक थमा …
Read More »मेरा उसका परिचय इतना – अंसार कंबरी
मेरा उसका परिचय इतना वो नदिया है, मैं मरुथल हूँ। उसकी सीमा सागर तक है मेरा कोई छोर नहीं है मेरी प्यास चुरा ले जाए ऐसा कोई चोर नहीं है। मेरा उसका नाता इतना वो खुशबू है, मैं संदल हूँ। उस पर तैरें दीप शिखाएँ सूनी सूनी मेरी राहें। उसके तट पर भीड़ लगी है, कौन करेगा मुझसे बातें। मेरा …
Read More »भागे लेकर बल्ला – रामानुज त्रिपाठी
चूहे राज क्रिकेट टीम के चुने गए कप्तान अपनी बल्लेबाजी का था उनको बहुत गुमान पैड बांध दस्ताना पहने हेलमैट एक लगाए टास जीत कर खुद ही पहले बैटिंग करने आए उधर दूसरी क्रिकेट टीम का बंदर था कप्तान उसे क्रिकेट के दाँव पेंच की थी पूरी पहचान पहला ही ओवर बंदर ने बिल्ली से फिंकवाया चूहे को आउट करने …
Read More »सूने दालान – सोम ठाकुर
खिड़की पर आँख लगी देहरी पर कान धूल–भरे सूने दालान हल्दी के रूप भरे सूने दालान। परदों के साथ साथ उड़ता चिड़ियों का खंडित–सा छाया क्रम झरे हुए पत्तों की खड़–खड़ में उगता है कोई मनचाहा भ्रम मंदिर के कलशों पर ठहर गई सूरज की काँपती थकन धूल–भरे सूने दालान। रोशनी चढ़ी सीढ़ी–सीढ़ी डूबा–मन जीने की मोड़ों को घेरता अकेलापन …
Read More »मैं फिर अकेला रह गया – दिनेश सिंह
बीते दिसंबर तुम गए लेकर बरस के दिन नए पीछे पुराने साल का जर्जर किला था ढह गया मैं फिर अकेला रह गया खुद आ गए तो भा गए इस ज़िन्दगी पर छा गए जितना तुम्हारे पास था वह दर्द मुझे थमा गए वह प्यार था कि पहाड़ का झरना रहा जो बह गया मैं फिर अकेला रह गया रे …
Read More »हम तुम – रामदरश मिश्र
सुख के, दुख के पथ पर जीवन, छोड़ता हुआ पदचाप गया तुम साथ रहीं, हँसते–हँसते, इतना लंबा पथ नाप गया। तुम उतरीं चुपके से मेरे यौवन वन में बन के बहार गुनगुना उठे भौंरे, गुंजित हो कोयल का आलाप गया। स्वपनिल–स्वपनिल सा लगा गगन, रंगों में भीगी सी धरती जब बही तुम्हारी हँसी हवा–सी, पत्ता पत्ता काँप गया। जाने कितने …
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