नखरे सलाई के – दिनेश प्रभात

नखरे सलाई के – दिनेश प्रभात

आ गये दिन लौट कर,
कंबल रज़ाई के।

सज गये दूकान पर फिर ऊन के गोले,
पत्नियों के हाथ में टंगने लगे झोले,
देखने लायक हुए
नखरे सलाई के।

धूप पाकर यूं लगा, ज्यों मिल गई नानी,
और पापा–सा लगा, प्रिय गुनगुना पानी,
हो गये चूल्हे,
कटोरे रसमलाई के।

ले लिया बैराग मलमल और खादी ने,
डांट की चाबुक थमा ली आज दादी ने,
कान तक टोपा दिखा,
शैतान भाई के।

क्या शहरÊ क्या गाँव, क्या छोटा बड़ा तबका,
प्यार उमड़ा जा रहा है धूप पर सबका,
भेज दो अब तार,
सूरज को बधाई के।

उठ गये क्या देव? सोये भाग्य सब जागे,
टूटने–जुड़ने लगे फिर भाग्य के धागे,
हर तरफ चर्चे चले
मांडे–सगई के।

~ दिनेश प्रभात

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