उर्वशी (नर प्रेम - नारी प्रेम): रामधारी सिंह दिनकर

उर्वशी (नर प्रेम – नारी प्रेम): रामधारी सिंह दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर साहित्य के वह सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी कलम में दिनकर यानी सूर्य के समान चमक थी। उनकी कविताएं सिर्फ़ उनके समय का सूरज नहीं हैं बल्कि उसकी रौशनी से पीढ़ियां प्रकाशमान होती हैं।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (जन्म: 23 सितंबर, 1908, बिहार; मृत्यु: 24 अप्रैल, 1974, तमिलनाडु) हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, कवि एवं निबंधकार थे। ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। उनको राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत, क्रांतिपूर्ण संघर्ष की प्रेरणा देने वाली ओजस्वी कविताओं के कारण असीम लोकप्रियता मिली। दिनकर जी ने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। साहित्य के रूप में उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेज़ी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था।

उर्वशी (नर प्रेम – नारी प्रेम): रामधारी सिंह दिनकर

How differently is the emotion of love felt by men and women! Here is an excerpt from Ramdhari Singh Dinkar’s famous book “Urvashi”. Meanings of some difficult words are given below:

इसमे क्या आश्चर्य? प्रीति जब प्रथम–प्रथम जगती है‚
दुर्लभ स्वप्न–समान रम्य नारी नर को लगती है।

कितनी गौरवमयी घड़ी वह भी नारी जीवन की‚
जब अजेय केसरी भूल सुधबुध समस्त तन मन की‚
पद पर रहता पड़ा‚ देखता अनिमिष नारी मुख को‚
क्षण–क्षण रोमाकुलित‚ भोगता गूढ़ अनिर्वच सुख को!

यही लग्न है वह जब नारी‚ जो चाहे‚ वह पा ले‚
उडुपों की मेखला‚ कौमुदी का दुकूल मंगवा ले।
रंगवा ले उंगलियां पदों की ऊषा के जावक से‚
सजवा ले आरती पूर्णिमा के विधु के पावक से।

तपोनिष्ठ नर का संचित तप और ज्ञान ज्ञानी का‚
मानशील का मान‚ गर्व गर्वीले‚ अभिमानी का‚
सब चढ़ जाते भेंट‚ सहज ही‚ प्रमदा के चरणों पर‚
कुछ भी बचा नहीं पाता नारी से उद्वेलित नर।

किंतु‚ हाय‚ यह उद्वेलन भी कितना मायामय है!
उठता धधक सहज जितनी आतुरता से पुरुष हृदय है‚
उस आतुरता से न ज्वार आता नारी के मन में‚
रखा चाहती वह समेट कर सागर को बंधन में।

किंतु‚ बंध को तोड़ ज्वार जब नारी में जब जगता है‚
तब तक नर का प्रेम शिथिल‚ प्रशमित होने लगता है।
पुरुष चूमता हमें अर्ध निंद्रा में हम को पा कर‚
पर‚ हो जाता विमुख प्रेम के जग में हमें जगा कर।

और‚ जगी रमणी प्राणों में लिये प्रेम की ज्वाला‚
पंथ जोहती हुई पिरोती बैठ अश्रु की माला।

∼ “उर्वशी (नर प्रेम – नारी प्रेम)” poem by  रामधारी सिंह ‘दिनकर’

शब्दार्थः

दुर्लभ ∼ अप्राप्य
अनिमिष ∼ एक टक
अनिर्वच ∼ अकथनीय
उडुपों ∼ सितारों
मेखला ∼ करघनी
कौमुदी ∼ चांदनी
दुकूल ∼ दुपट्टा
जावक ∼ वेग
विधु ∼ चंद्रमा
पावक ∼ आग्नि
प्रमदा ∼ नारी
उद्वेलित ∼ बेचैन मन वाला
ज्वार ∼ उफान
प्रशमित ∼ शांत

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