Home » Poems For Kids » Poems In Hindi » कृष्ण मुक्ति – राजीव कृष्ण सक्सेना

कृष्ण मुक्ति – राजीव कृष्ण सक्सेना

कितना लम्बा था जीवन पथ,
थक गए पाँव डेग भर भर कर,
ढल रही साँझ अब जीवन की,
सब कार्य पूर्ण जग के इस पल।

जान मानस में प्रभु रूप जड़ा,
यह था उत्तरदायित्व बड़ा,
सच था या मात्र छलावा था,
जनहित पर मैं प्रतिबद्ध अड़ा।

अब मुक्ति मात्र की चाह शेष,
अब तजना है यह जीव वेश,
प्रतिविम्ब देह की माया थी,
माया था जीवन काल देश।

अब है बंसी की मुक्त तान,
जीवन का अंतिम वृंदगान,
कुछ पल जग में उन्मुक्त हास्य,
फिर चिर प्रलय चिर गरल पान।

कैसा अदभुत था महायुद्ध,
या स्वप्न मात्र मन का विशुद्ध,
कुछ था अंतिम निरकारश वहां,
या नियति मात्र था काल कुद्ध।

ले कर के आया मुक्ति बाण,
पल में घाट से उड़ गए प्राण,
थी नियति व्याघ का काल तीर,
दृष्टा उस पल के मूक जीव।

जग के प्रपंच सब दिग दिगंत,
इक पल न रुके वे मूल तंत्र,
उस पल कलियुग प्रारम्भ हुआ,
द्वापर युग का हो गया अंत।

∼ राजीव कृष्ण सक्सेना

About Rajiv Krishna Saxena

प्रो. राजीव कृष्ण सक्सेना - जन्म 24 जनवरी 1951 को दिल्ली मे। शिक्षा - दिल्ली विश्वविद्यालय एवं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में। एक वैज्ञानिक होने पर भी प्रोफ़ेसर सक्सेना को हिंदी सहित्य से विशेष प्रेम है। उन्होंने श्रीमद भगवतगीता का हिंदी में मात्राबद्ध पद्यानुवाद किया जो ''गीता काव्य माधुरी'' के नाम से पुस्तक महल दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुआ है। प्रोफ़ेसर सक्सेना की कुछ अन्य कविताएँ विभिन्न पत्रिकाओं मे छप चुकी हैं। उनकी कविताएँ लेख एवम गीता काव्य माधुरी के अंश उनके website www.geeta-kavita.com पर पढ़े जा सकते हैं।

Check Also

Kamika Ekadashi - Hindu Festival

2018 Kamika Ekadashi – Hindu Festival

Kamika Ekadashi, like any other ekadashi is considered to be an auspicious day to worship …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *