घेरण्ड संहिता का सम्पूर्ण सार: Gheranda Samhita - One of three major texts of Hatha Yoga

घेरण्ड संहिता का सम्पूर्ण सार: Gheranda Samhita – One of three major texts of Hatha Yoga

Gheranda Samhita is one of the three major texts of Hatha Yoga . The other two texts are Hatha Yoga Pradipika and Shiva Samhita . It was composed in the latter half of the 17th century. Among the three texts of Hatha Yoga, it is the most extensive and complete. It provides practical education of Saptanga Yoga. Gheranda Samhita is the oldest and first text, which has a detailed description of Yoga ‘s asanas , mudras , pranayama , neti , dhauti etc. The preacher of this text is Gheranda Muni, who gave teachings to his disciple King Chandakpali when he asked questions related to Yoga.

परिचय:

एक समय की बात है कि योगाभ्यास के लिए जिज्ञासा करने वाले राजा चण्डकपाली नामक एक शिष्य महर्षि घेरण्ड की कुटी में गए और उन्हें विनय एवं भक्ति-पूर्वक प्रणाम करके महर्षि से प्रश्न किए।

इसमें चार प्रश्नों का समावेश है। पहला: तत्व ज्ञान क्या है? दूसरा: घटस्थ योग क्या है? तीसरा: इस योग का अभ्यास हम कैसे करें और चौथा: क्या योग द्वारा ज्ञान प्राप्ति संभव है?

तत्वज्ञान:

सर्वप्रथम हम पहले प्रश्न को समझें। तत्व का अर्थ होता है वास्तविकता। तत्व ज्ञान का अर्थ होता है मनुष्य शरीर, मनुष्य मन और जीवात्मा के पीछे जो वास्तविकता या सत्य है उसका ज्ञान।

घटस्थ योग:

दूसरा प्रश्न है घटस्थ योग क्या है? घट का अर्थ होता है : घड़ा। जब हम घड़े की कल्पना करते हैं, तब मिट्टी से बनी एक आकृति मनस-पटल पर उभरती है। हम उसकी बाह्य आकृति को देखते हैं। पर हमें यह मालूम नहीं रहता कि उसके अंदर क्या भरा है। ऐसे ही शरीर रूपी घट के भीतर कौन-कौन-से तत्व और शक्तियां हैं – यह कोई नहीं जानता। वह शक्ति क्या है, जिसने शरीर की रचना की। वह कौन-सी शक्ति है, जिसने हमारे शरीर के भीतर अन्य शक्तियों की उत्पत्ति की।

अब तीसरा प्रश्न आता है कि योग का अभ्यास कैसे हो। पूरे ग्रंथ में इसी विषय की चर्चा की गई है कि व्यक्ति को किस प्रकार योगाभ्यास करना चाहिए। चौथा प्रश्न है – क्या योगाभ्यास से तत्व ज्ञान को प्राप्त करना संभव है?

घटस्थ योग क्या है?

‘घट’ शब्द संस्कृत में घड़ा (पात्र, देह) के लिए प्रयोग होता है। ‘स्थ’ का अर्थ है—“जिसमें निवास किया गया हो” या “जो उसमें स्थित हो”। इसलिए घटस्थ योग का शाब्दिक अर्थ है—“वह योग, जिसमें साधक अपने शरीर (घट) को साधना का पात्र बनाता है।”

दार्शनिक अर्थ

महर्षि घेरण्ड के अनुसार – मनुष्य का शरीर एक घट (पात्र) है, जिसमें पाँच तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और चेतना स्थित हैं। यह शरीर ही वह साधन है, जिसके माध्यम से साधक शुद्धि, स्थिरता, नियंत्रण और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है।

इसलिए उन्होंने कहा – “जो घट (शरीर) को योग के साधन के रूप में स्वीकार करता है, वही घटस्थ योग का सच्चा साधक है।

घटस्थ योग की परिभाषा (घेरण्ड संहिता अनुसार):

“घटयोगो नाम सप्ताङ्गो योगः।”

(घेरण्ड संहिता, 1.10)

अर्थात् – “घटयोग सात अंगों वाला योग है।

इस ग्रंथ का उद्देश्य है—शरीर, मन और आत्मा की क्रमिक शुद्धि द्वारा पूर्ण योग साधना प्राप्त करना।

योग के सात अंग (सप्त साधन)

इसमें योग की सात अवस्थाओं का वर्णन है, जिन्हें सप्त-साधन कहा गया है।

घेरण्ड संहिता के सप्त-साधन ‘Seven Steps of Yoga’

  1. षट्कर्म (शुद्धिकरण क्रियाएँ) – शरीर की शुद्धि
  2. आसन (Postures) – स्थिरता
  3. मुद्रा (Energy Locks) – शरीर में शक्ति संचय
  4. प्रत्याहार (Sense Withdrawal) – इन्द्रियों पर नियंत्रण
  5. प्राणायाम (Breath Control) – प्राण का नियमन
  6. ध्यान (Meditation) – एकाग्रता
  7. समाधि (Union with Self) – परमात्मा से एकत्व

(1) षट्कर्म

शरीर शुद्धिकरण की छह क्रियाएँ – शरीर को शुद्ध रखने और योग के लिए तैयार करने हेतु 6 क्रियाएँ बताई गई हैं:

  • धौति: शरीर की सफाई (अंदरूनी अंगों की शुद्धि)
  • बस्ति: आँतों की सफाई (जल या वायु द्वारा)
  • नेति: नासिका शुद्धि (सूत्र या जल द्वारा)
  • त्राटक: दृष्टि स्थिरता अर्थात् एक बिंदु पर देखने की क्रिया
  • नौलि: उदर की मांसपेशियों का संकुचन प्रसार
  • कपालभाति: मस्तिष्क को उज्ज्वल करने वाली क्रिया (तेज श्वास निकालना)
  • धौति:
    अंतर्धौति: वातसार अंतर्धौति, वारिसार अंतर्धौति, अग्निसार अंतर्धौति, बहिष्कृत अंतर्धौति
    दंत धौति: दंत मूल धौति, जिह्वा शोधन धौति, कर्ण रंध्र धौति, कपालरंध्र धौति
    धौति: दण्ड धौति, वमन धौति, वस्त्र धौति, मूलशोधन धौति—जल बस्ति, स्थल बस्ति
    नेति क्रिया: जल नेति, सूत्र नेति
    लौलिकी: मध्यम नौलि, वाम नौलि, दक्षिण नौलि
  • त्राटक:
    कपालभाति: वातक्रम कपालभाति, व्युत्क्रम कपालभाति, शीतक्रम कपालभाति

(2) आसन – शरीर की स्थिरता और शक्ति

घेरण्ड संहिता में 84 आसनों का वर्णन मिलता है, जिनमें से 32 मुख्य आसन बताए गए हैं।

योगासन प्रकरण:

आसन भेद: 1. सिद्धासन, 2. पद्मासन, 3. भद्रासन, 4. मुक्तासन, 5. वज्रासन, 6. स्वस्तिकासन, 7. सिंहासन, 8. गोमुखासन, 9. वीरासन, 10. धनुरासन, 11. मृतासन (शवासन), 12. गुप्तासन, 13. मत्स्यासन, 14. मत्स्येन्द्रासन, 15. गोरक्षासन, 16. पश्चिमोत्तानासन, 17. उत्कटासन, 18. संकटासन, 19. मयूरासन, 20. कुक्कुटासन, 21. कूर्मासन, 22. उत्तान कूर्मासन, 23. मण्डूकासन, 24. उत्तान मण्डूकासन, 25. वृक्षासन, 26. गरुड़ासन, 27. शलभासन, 28. मकरासन, 29. उष्ट्रासन, 30. भुजंगासन, 31. गर्भासन, 32. शशांकासन।

सार: आसन शरीर को स्थिर, लचीला और मन को ध्यान के लिए तैयार करते हैं।

(3) मुद्रा और बन्ध प्रकरण

बन्ध: मूलबन्ध, जालंधर बन्ध, महाबन्ध

मुद्रा: ऊर्जा के संरक्षण की क्रियाएँ – घेरण्ड संहिता में 16 मुद्राओं का उल्लेख है। मुद्रा शरीर की ऊर्जा को भीतर स्थिर करती है और प्राण-शक्ति को ऊपर की ओर प्रवाहित करती है।

मुद्राएँ: 1. महामुद्रा, 2. नभो मुद्रा, 3. खेचरी मुद्रा, 4. महाबन्ध मुद्रा, 5. विपरीतकरणी मुद्रा, 6. योनि मुद्रा, 7. वज्रोली मुद्रा, 8. शक्तिचालिनी मुद्रा, 9. तड़ागी मुद्रा, 10. माण्डुकी मुद्रा, 11. अश्विनी मुद्रा, 12. पाशिनी मुद्रा, 13. काकी मुद्रा, 14. मातांगिनी मुद्रा, 15. भुजंगिनी मुद्रा, 16. शाम्भवी मुद्रा।

(4) प्रत्याहार प्रकरण

प्रत्याहार: इन्द्रियों पर नियंत्रण – बाहरी विषयों से इन्द्रियों को हटाकर भीतर की ओर मोड़ना।

षट् शत्रु वर्णन – महर्षि घेरण्ड ने कहा कि अब मैं प्रत्याहार का वर्णन करता हूँ, जिसे करने से कामादि शत्रु का नाश होता है। जहाँ-जहाँ यह चंचल मन विचरण करे, उसे वहीं-वहीं से लौटाने का प्रयत्न करते हुए आत्मा को वश में करें। पुरस्कार, तिरस्कार, सुनने में सुखद, सुनने में अरुचिकर वचनों से मन को हटाकर आत्मा को वश में करें। सुगंध और दुर्गंध से मन को हटा लें। मधुर, अम्ल आदि रसों की ओर मन आकृष्ट हो तो उसे वहाँ से हटाकर आत्मा को वशीभूत करें, यही प्रत्याहार है।

अपनी कमजोरी को पहचानने का प्रयत्न करें। आत्म-निरीक्षण के द्वारा यह देख लो कि किस परिस्थिति में तुम अपना संतुलन और धैर्य खो बैठते हो? कब निराशा का प्रभाव तुम पर पड़ने लगता है?

इसके बाद दूसरी अवस्था आती है आत्म लयत्व – स्वयं की इंद्रिय अनुभूतियों को देखने की कि मुझे किस प्रकार के अनुभव अपनी इंद्रियों द्वारा प्राप्त हो रहे हैं। परंतु केवल देखना नहीं है, वरन हर इंद्रिय की कार्य परिधि में जो चीज दिखाई दे, जिस चीज का अनुभव हो, उसकी सजगता रहनी चाहिए।

अतः विचारों को रोकने का अर्थ हो गया स्तंभन शक्ति, विचारों को बाँधने की शक्ति, बाह्य विषयों और विचारों का जो प्रवाह है, उसे बाँध देना, रोक देना और उसकी दिशा पलट देना। जब यह धारा अपनी दिशा को बदलती है, तब वह प्रत्याहार की, अंतर्मुखी अवस्था कहलाती है। इस प्रकार, प्रत्याहार दुःख के कारण का समूल नाश करता है। तत्पश्चात् मन को उच्च साधना में लगाया जा सकता है।

(5) प्राणायाम प्रकरण:

घेरण्ड संहिता में बताए गए प्राणायाम – जो शरीर, मन और आत्मा को संतुलित करते हैं।

1. साधन प्राणायाम – प्रारंभिक श्वास नियंत्रण, 2. सूर्यभेदी, 3. उज्जायी, 4. सीत्कारी, 5. भस्त्रिका, 6. भ्रामरी, 7. मूर्छा, 8. केवली प्राणायाम
सार – प्राणायाम से नाड़ी शुद्ध होती है, मन नियंत्रित होता है और आत्मिक स्थिरता आती है।

(6) ध्यान प्रकरण (ध्यान – एकाग्रता और आत्म-बोध)

ध्यान मन को एक बिंदु पर स्थिर करने की प्रक्रिया है। इसके माध्यम से साधक आत्मा का अनुभव करता है।

महर्षि घेरण्ड ध्यान की तीन अवस्थाओं की चर्चा करते हुए कहते हैं : स्थूल ध्यान, ज्योति ध्यान और सूक्ष्म ध्यान के भेद से ध्यान तीन प्रकार का होता है।

स्थूल ध्यान: स्थूल ध्यान वह कहलाता है, जिसमें मूर्तिमय इष्ट देव का ध्यान हो। ज्योतिर्मय ध्यान वह है, जिसमें तेजोमय ज्योति रूप ब्रह्म का चिंतन हो तथा सूक्ष्म ध्यान उसे कहते हैं, जिसमें बिंदुमय ब्रह्म कुंडलिनी शक्ति का चिंतन किया जाए।

स्थूल ध्यान की दो विधियों का वर्णन महर्षि घेरण्ड ने किया है। पहली विधि है – हृदय स्थान या अनाहत चक्र पर ध्यान और दूसरी विधि है – ब्रह्मरंध्र या सहस्रार चक्र पर ध्यान।

नियमित ध्यान से शांति, करुणा और आनन्द प्राप्त होता है।

(7) समाधि – आत्मा और परमात्मा का मिलन

जब साधक शरीर और मन से परे होकर केवल चेतना मात्र रह जाता है, वही समाधि है।

समाधि प्रकरण: 1. ध्यानयोग समाधि, 2. नादयोग समाधि, 3. रसानन्द समाधि, 4. लयसिद्धि समाधि, 5. भक्तियोग समाधि, 6. मन मूर्छा समाधि, 7. समाधि योग महात्म्य, 8. योग की अंतिम अवस्था।

यत्र योगः तत्र समाधिः‘ – जहाँ योग है, वहीं परम ऐक्य है।

Gheranda Samhita (IAST: gheraṇḍasaṁhitā, घेरण्ड संहिता, meaning “Gheranda’s collection”) is a Sanskrit text of Yoga in Hinduism. It is one of the three classic texts of hatha yoga (the other two being the Hatha Yoga Pradipika and the Shiva Samhita), and one of the most encyclopedic treatises in yoga. Fourteen manuscripts of the text are known, which were discovered in a region stretching from Bengal to Rajasthan. The first critical edition was published in 1933 by Adyar Library, and the second critical edition was published in 1978 by Digambarji and Ghote. Some of the Sanskrit manuscripts contain ungrammatical and incoherent verses, and some cite older Sanskrit texts.

It is likely a late 17th-century text, probably from northeast India, structured as a teaching manual based on a dialogue between Gheranda and Chanda. The text is organized into seven chapters and contains 351 shlokas (verses).

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