महर्षि घेरण्ड ने प्रथम अध्याय के षट्कर्म प्रकरण के 55वें सूत्र में कपालभाति की व्याख्या करते हुए कहा है:
वातक्रमेण व्युत्क्रमेण शीत्क्रमेण विशेषतः।
भालभाति त्रिधा कुर्यात्कफदोषं निवारयेत्॥
(घे.सं. 1/55)
इस सूत्र में महर्षि घेरण्ड ने कपालभाति के तीन प्रकार कहे हैं: वातक्रम कपालभाति, व्युत्क्रम कपालभाति व शीत्क्रम कपालभाति। इन तीनों प्रकार की कपालभाति का अभ्यास करने से शरीर के कफ दोष ठीक होते हैं।
सूत्र में कपालभाति को भाल भाति कहा गया है। यहाँ भाल का अर्थ ललाट तथा भाति का अर्थ धौंकनी से लगाया गया है। इस क्रिया में वायु को धौंकनी के समान तीव्र गति से बाहर की ओर फेंका जाता है। दूसरा शब्द कपालभाति है। यहाँ पर कपाल का अर्थ खोपड़ी अर्थात् मस्तिष्क से लिया गया है और भाति का अर्थ चमकाने से लिया है। जब शक्ति व तेजी से धौंकनी के समान वायु को बाहर फेंका जाता है तो हमारे मस्तिष्क के दोष ठीक होते हैं। वहाँ पर चमक पैदा होती है।
कपालभाति की गिनती प्राणायाम में भी होती है क्योंकि कपालभाति से जहाँ शारीरिक शुद्धि होती है, वहीं मानसिक शुद्धि भी होती है। मानसिक शुद्धि का क्रम शारीरिक शुद्धि के बाद आता है। अतः यही कारण रहा होगा कि हमारे ऋषियों ने षट्कर्म में कपालभाति को छठा स्थान दिया है क्योंकि पहले के षट्कर्म के प्रकारों से हम पहले शरीर की शुद्धि करते हैं, उसके बाद कपालभाति से शरीर व मन की शुद्धि करते हुए मन को एकाग्र करते हैं। यह क्रिया हमारे प्राणमय कोश को प्रभावित करती है। कपालभाति से शरीर में प्राण का विचरण होता है। प्राण जागृत व सक्रिय होता है। इसलिए इसे प्राणायाम की श्रेणी में भी रखा गया है।
महर्षि पतंजलि ने मन को शांत व स्थिर करने के उपाय के लिए योग सूत्र के प्रथम खण्ड के सूत्र 34 में कपालभाति प्राणायाम को इस प्रकार बताया है:
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य
(योग सूत्र 1/34)
अर्थात् इस सूत्र के अनुसार, फेफड़ों में स्थित वायु को विशेष प्रयत्न से बाहर फेंकना प्रच्छर्दन कहलाता है। बाहर फेंकी हुई वायु को बाहर ही रोक देना विधारण कहलाता है। प्रच्छर्दन व विधारण—इन दोनों के अभ्यास से मन शांत व स्थिर होता है।
षट्कर्म तथा प्राणायाम के आधार पर कपालभाति में अंतर केवल इतना है कि जब इसे प्राणायाम की श्रेणी में रखा जाता है तो कपालभाति का अभ्यास करते समय साधक केवल वायु का ही प्रयोग करता है, जबकि साधक जब कपालभाति का अभ्यास षट्कर्म के प्रकार के रूप में करता है तो वायु तत्व व जल तत्व—इन दोनों का प्रयोग किया जाता है।
अब हम कपालभाति के तीनों प्रकारों को विस्तार में समझेंगे।

(क): वातक्रम कपालभाति (Vaatkram Kapalbhati)
Vatakrama Kapalbhati is a foundational Hatha yoga purification technique focused on air cleansing. It involves active, forceful exhalations and passive, natural inhalations to clear the respiratory system, improve digestion and energize the mind.
इड़या पूरयेद्वायुं रेचयेत्पिंगलया पुनः।
पिंगलया पूरयित्वा पुनश्चन्द्रेण रेचयेत्॥
पूरकं रेचकं कृत्वा वेगेन न तु धारयेत्।
एवमभ्यास योगेन कफ दोषं निवारयेत्॥
(घे.सं. 1/56-57)
इड़ा नाड़ी अर्थात् बाएं नासारंध्र से श्वास को भरना तथा पिंगला नाड़ी अर्थात् दाएं नासारंध्र से श्वास को बाहर निकालना, पश्चात् दाएं नासारंध्र (पिंगला नाड़ी) से श्वास को भरना तथा बाएं नासारंध्र (इड़ा नाड़ी) से श्वास को बाहर निकाल देना। पूरक-रेचक की इस क्रिया को तेज गति से न करें। कपालभाति से कफ दोष ठीक होते हैं।
वातक्रम कपालभाति के अभ्यास में कफ का शोधन करने के लिए केवल वायु का ही प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसे वातक्रम कपालभाति कहा जाता है। इस अभ्यास में नासिका से सहज रूप में श्वास अंदर लेकर बल-पूर्वक नासिका से ही बाहर फेंका जाता है। इस अभ्यास को प्राणायाम की श्रेणी में कपालभाति प्राणायाम कहा जाता है।

सावधानी:
हर्निया, उच्च रक्तचाप व हृदय रोगी को इस क्रिया का अभ्यास नहीं करना चाहिये। क्रिया करते समय तनाव न बनाएं।
विधि:
किसी भी स्थिर आसन, जैसे पद्मासन, अर्ध-पद्मासन या सुखासन में बैठें। रीढ़, गर्दन व सिर को सीधा करें। दोनों हाथों को चिन्मुद्रा में दोनों घुटनों पर रख दें। आँखों को कोमलता से बंद करें। पूरे शरीर को शिथिल करें। दोनों नासारंध्रों से श्वास को अन्दर भरें। अब बल-पूर्वक श्वास को नासारंध्रों से बाहर निकालें। क्रिया को दोहराते जाएं। श्वास भरने में शक्ति न लगाएं। लेकिन श्वास को बाहर फेंकने में शक्ति का प्रयोग अवश्य करें। शुरू में क्रिया को धीरे-धीरे करें। बाद में गति को भी बढ़ा दें। एक आवृत्ति में 20 बार श्वास की क्रिया को करें। पश्चात् एक गहरा श्वास भरें तथा श्वास को अधिक से अधिक बाहर निकालते हुए फेफड़ों को पूरी तरह खाली कर दें। श्वास को बाहर ही रोक दें अर्थात बाह्य कुम्भक लगा लें। बाह्य कुम्भक में त्रिबंध भी लगाएं। यथासम्भव श्वास को बाहर रोकने के बाद बंधों को क्रमशः खोलते हुए (अर्थात जालंधर, उड्डियान एवं मूलबंध के क्रम में) श्वासों को सामान्य करें। यह एक आवृत्ति हुई। इसे दो बार और दोहराएं। अभ्यास पक्का होने पर धीरे-धीरे आवृत्तियों को बढ़ाते जाएं तथा प्रत्येक आवृत्ति में की जाने वाली श्वसन क्रिया को भी बढ़ा लें। लेकिन अभ्यास करते समय अपनी क्षमता से अधिक कभी न करें।
सजगता:
अभ्यासी को इस क्रिया के अभ्यास के दौरान अपनी सजगता का केन्द्र चिदाकाश को बनाना है। यह भावना बनानी है कि प्राण का ऊर्ध्वगमन हो रहा है तथा प्राणिक तरंगें चिदाकाश को प्रभावित कर रही हैं।
नोट:
वातक्रम कपालभाति क्रिया करने के लिए बाएं नासारंध्र से सहज रूप में श्वास लेकर बल-पूर्वक दाएं नासारंध्र से बाहर निकालना तथा सहज रूप से दाएं नासारंध्र से भरकर बल-पूर्वक बाएं नासारंध्र से बाहर निकालना। इसे बार-बार एक आवृत्ति में 20 बार करना तथा अंत में यथाशक्ति बाह्य कुम्भक में रुकना। इसे दो से तीन बार दोहराना। वातक्रम कपालभाति इस विधि से भी की जा सकती है।
लाभ:
- पाचन अंग सक्रिय बनते हैं।
- प्राण का ऊर्ध्वगमन होता है।
- मस्तिष्क में ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है।
- रक्त का शोधन ठीक प्रकार से होता है।
- कफ दोष ठीक होते हैं।
- नजला, जुकाम, खाँसी, एलर्जी, टी.बी. व सिर दर्द आदि रोग ठीक होते हैं।
- इड़ा व पिंगला नाड़ियाँ सक्रिय बनती हैं। प्राण का प्रवाह सुषुम्ना नाड़ी से होने लगता है, जिससे कुण्डलिनी जागृत होती है।
- मन शांत होता है।
- ध्यान के अभ्यासी के लिए यह क्रिया बहुत ही सहायक है।
(ख): व्युत्क्रम कपालभाति (Vyutkrama Kapalbhati)
Vyutkrama Kapalbhati is a traditional Hatha Yoga shatkarma (purification technique) where you sniff lukewarm saline water through your nostrils and expel it through your mouth. It is a powerful practice for deep nasal irrigation that relieves sinus congestion, clears mucus and reduces respiratory issues like asthma.
व्युत्क्रम कपालभाति के अभ्यास में जल का प्रयोग किया जाता है।
नासाभ्यां जलमाकृष्य पुनर्वक्त्रेण रेचयेत्।
पायं पायं व्युत्क्रमेण श्लेष्मादोषं निवारयेत्।।
(घे.सं 1/58)
अर्थात् नासिका के दोनों छिद्रों से जल को अंदर लेकर मुख से बाहर निकालना व्युत्क्रम कपालभाति कहलाता है। यह क्रिया कफ दोषों का निवारण करती है।

सावधानी:
क्रिया को करते समय तनाव न बनाएं।
विधि:
हल्का नमकीन गुनगुना जल किसी एक पात्र में ले लें। इस क्रिया को स्नान घर या किसी नाली के पास खड़े होकर करें। जैसे स्नान घर में बने वॉश बेसन के पास खड़े हो जाएं। शरीर को थोड़ी देर आँखें बंद करके शिथिल कर लें, ताकि शारीरिक व मानसिक तनाव खत्म हो जाए। दाएं हाथ की हथेली का कप बनाकर उसमें पानी को भर लें। अब दोनों नासारंध्रों से जल को भीतर ऐसे ग्रहण करें कि वह गले व मुँह से होता हुआ बाहर आ जाए।
इस क्रिया में जल को नासिका से लेकर मुँह से बाहर निकालना है। इसका अभ्यास जल नेति के समान होता है। इसे दो से तीन बार दोहराएं। क्रिया पूरी करने के बाद दोनों हाथ घुटनों से ऊपर जंघाओं पर रखकर वातक्रम कपालभाति का अभ्यास कर लें, ताकि नासिका में रुकी हुई जल की बूंदें बाहर चली जाएं।
लाभ:
- नासिका, गले व मुँह की सफाई होती है।
- कफ धातु को संतुलित करने में यह क्रिया सहायक है।
- बिंदु चक्र के जागृत होने की संभावना बढ़ती है।
- मस्तिष्क के दोष ठीक होते हैं।
(ग) शीतक्रम कपालभाति (Sheetkrama Kapalbhati)
Sheetkrama Kapalbhati is a traditional Hatha Yoga cleansing practice (Shatkarma). Unlike the standard breathing technique, it involves taking lukewarm, slightly salted water in through the mouth, letting it pass through the nasal cavity and forcefully expelling it through the nostrils to clear the sinuses and respiratory tract.
यह कपालभाति का तीसरा अभ्यास है। इस अभ्यास में मुख से जल को खींच कर नासारंध्रों से बाहर निकाला जाता है। ‘घेरण्ड संहिता‘ के प्रथम खण्ड के सूत्र 59 व 60 में शीतक्रम कपालभाति की व्याख्या महर्षि घेरण्ड ने इस प्रकार की है:
शीत्क्रत्य पीत्वा वक्त्रेण नासानालैर्विरेचयेत्।
एवमभ्यासयोगेन कामदेव समो भवेत्॥
न जायते वार्द्धकं च ज्वरो नैव प्रजायते।
भवेत्स्वच्छन्द देहश्च कफदोषं निवारयेत्॥
(घे.स. 1/59-60)
शीतली प्राणायाम करते हुए जल को मुख में खींच कर नासारंध्रों से बाहर निकाल देना शीतक्रम कपालभाति कहलाता है। जब साधक इसका अभ्यास करता है तो उसका शरीर कामदेव के समान सुंदर बनता है। बुढ़ापा व ज्वर शरीर में नहीं आते। शरीर स्वच्छ बनता
है तथा कफ दोष ठीक होते हैं।

सावधानी:
अभ्यास करते समय तनाव बिल्कुल न बनने दें। क्रिया को प्रातःकाल खाली पेट करें।
विधि:
किसी एक पात्र में हल्का नमकीन गुनगुना पानी भर लें। स्नान घर में वॉश बेसन के पास खड़े हो जाएं। कमर से हल्का-सा आगे की ओर झुकें। दाएं हाथ की हथेली का कप बनाकर उसे जल से भर लें। जिह्वा की नलिका बनाकर शीतली प्राणायाम करते हुए जल को मुख में खींच लें। लेकिन जल को मुँह में रोकना है। पीना नहीं है। अब जल को प्रयास-पूर्वक नासारंध्रों से निकाल दें। इसे दो बार और दोहरा लें। पश्चात् दोनों हाथ घुटनों से ऊपर जांघों पर रखकर वातक्रम कपालभाति का अभ्यास करते हुए नासिका में बची हुई जल की बूँदों को बाहर निकाल दें।
लाभ:
- चेहरे पर चमक बढ़ती है।
- शरीर की शुद्धि होती है।
- कफ दोष ठीक होते हैं।
- बुढ़ापा नहीं आता अर्थात् शरीर में झुर्रियाँ नहीं पड़तीं।
- बिंदु चक्र जागृत होता है।
- शरीर स्वस्थ बनता है।
- मन शांत होता है।
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