योग द्वारा स्मृति व बुद्धि विकास: Development of Memory & Intellect through Yoga

योग द्वारा स्मृति व बुद्धि विकास: Development of Memory & Intellect through Yoga

प्रत्येक मानव को जीवन में स्मरण-शक्ति की आवश्यकता है। स्मरण-शक्ति या स्मृति मानव-शास्त्र की फोटोग्राफ मशीन की तरह है, जो बुद्धि से विचारों को ग्रहण करती है, उनका रिकॉर्ड बनाती है और समय पड़ने पर उनको प्रस्तुत करती है। यदि हमारी स्मृति शक्ति अच्छी हो तो एक बार याद की गई बात कभी नष्ट नहीं होती। स्मृति के निम्न मुख्य भाग हैं:

योग द्वारा स्मृति व बुद्धि विकास:

  1. छाप (Impression) — किसी भी बात को बार-बार दोहराने से स्मृति पटल पर उसकी छाप जितनी गहरी हो, उतनी ही स्मृति अच्छी होगी। इसके लिए, हर बात या कार्य में ध्यान की जरूरत है। कोई चीज रखते हुए या काम करते हुए लापरवाही से नहीं, बल्कि जागरूकता के साथ करें।
  2. दोहराना (Repetition) — किसी भी बात को बार-बार दोहराने से स्मृति-पटल पर उसकी छाप पक्की हो जाती है। इसीलिए छात्रों को एक ही पाठ को बार-बार दोहराने के लिए कहा जाता है। इसी को अभ्यास कहा जाता है।
    “करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
    रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निशान।”
  3. सम्बन्ध जोड़ना (Association) — बहुत-सी बातों का आपस में सम्बन्ध जोड़ देने से वे जल्दी याद हो जाती हैं। वस्तुओं के नामों का पहला अक्षर मिलाकर याद कर लिया जाता है, इसे Abbreviation कहते हैं। जैसे UNO, यूनेस्को, भाजपा आदि। बहुत-सी चीजों के रंग, आकार, उनके उपयोग आदि के अनुसार सम्बन्ध बनाकर जोड़ें।
  4. अवलोकन शक्ति (Observation) — किसी जोहरी का किशन नाम का बालक था। जोहरी उसे सी.आई.डी. में भेजना चाहता था। उसने बालक को अवलोकन शक्ति का अभ्यास करवाया। वह उसके सामने अलग-अलग प्रकार के हीरे रख देता और एक मिनट के बाद उससे पूछता कि कौन-सा हीरा गायब है। बार-बार देखने के (gazing) के अभ्यास से उसे रंग, आकार, स्थान आदि के आधार पर याद रखना आ गया। उसकी स्मृति इतनी तेज हो गई कि एक बार व्यक्ति, मकान, दुकान आदि को देख लेता तो वह उसे याद हो जाता था। आगे चलकर वह एक बहुत प्रसिद्ध सी.आई.डी. अफसर बना। अलग-अलग वस्तुओं को एक मिनट देखने के पश्चात् उन्हें हटा कर उनके नाम लिखना, यह एक बहुत रोचक खेल है, जिसे KIM’s Game के नाम से जाना जाता है।
  5. कल्पना-शक्ति (Imagination) — जब हम किसी पुराने परिचित से मिलते हैं तो उसकी पुरानी बातों को याद करने के लिए ताल-मेल बिठाने के लिए कल्पना का सहारा लेते हैं। मन की आँख से उसे पहचानने की कोशिश करते हैं। अतः मन में किसी भी चीज की तस्वीर खींच लेना स्मृति को बढ़ाने में सहायक है। इसीलिए टेलीविजन, सिनेमा, विज्ञापन, नाटक आदि की बातें हमें ज्यादा याद रहती हैं।
  6. एकाग्रता (Concentration) — अर्जुन ने तीर चलाने से पहले चिड़िया की आँख पर एकाग्रता साधी। उसकी समूची चेतना लक्ष्य पर लगी थी। इसीलिए उसे सफलता मिली। अतः अच्छी स्मृति के लिए एकाग्रता अत्यन्त आवश्यक है।

इस प्रकार, स्मरण-शक्ति या स्मृति के विकास के लिए हमें ध्यान, जागरूकता, एकाग्रता, अवलोकन-शक्ति, कल्पना-शक्ति, इच्छा-शक्ति तथा निरंतर अभ्यास की आवश्यकता है और ये सब हमें योग साधना के अभ्यास से मिलते हैं।

हमारा मस्तिष्क एक अत्यन्त जटिल सुपर कम्प्यूटर जैसा है। मस्तिष्क में लगभग तीन करोड़ तंत्रिका कोशिकाएँ हैं, जिन्हें न्यूरॉन्स कहा जाता है। यहाँ सारे शरीर की प्रत्येक क्रिया, घटना, विचार आदि के संस्कार स्मृति पटल पर अंकित होते हैं। यहाँ संस्कारों का अथाह भंडार है। हमारे सारे ज्ञान का केन्द्र हमारा मस्तिष्क है।

आइये, देखते हैं कि योगिक क्रियाएँ किस प्रकार मस्तिष्क को सक्रिय बनाती हैं। योगिक शुद्धि क्रियाओं — नेति, धौति, वस्ति, नौली, कपालभाति व त्राटक के अभ्यास से शरीर की शुद्धि होती है। नेति क्रिया के अभ्यास से हमारी नासिका, गला, जिह्वा, साइनस गुहाएँ शुद्ध होती हैं। धौति क्रिया के अभ्यास से हमारी भोजन नली व पेट की शुद्धि होती है। वस्ति क्रिया के द्वारा हमारी बड़ी आँतों व मलाशय की शुद्धि होती है। नौली क्रिया के अभ्यास से हमारी पंचाग्नि ग्रन्थियाँ तथा पेड़ू (Pelvic region) के अंगों की शुद्धि होती है। कपालभाति के अभ्यास से हमारे कपाल, स्नायुतंत्र व श्वसन अंगों की शुद्धि होती है और त्राटक के अभ्यास से हमारे नेत्रों की शुद्धि होती है तथा हमारी एकाग्रता व इच्छा-शक्ति (will power) बढ़ती है। स्मृति पटल के दूषित संस्कार नष्ट होते हैं। इस प्रकार, मल दूर हो जाने पर समस्त शरीर व मस्तिष्क में भी शुद्ध रक्त व प्राणों का संचार सुन्दर बन जाता है, जिससे हमारी बुद्धि व स्मरण-शक्ति का विकास होता है।

योगासनों के नियमित अभ्यास से हमारी माँसपेशियों, नस-नाड़ियों, हड्डियों, रीढ़ आदि में लचक (flexibility) आती है। उनके भीतर जमा हुआ विजातीय द्रव्य अपना स्थान छोड़ देता है। शरीर के सभी जीवनदायक अंग, जैसे हृदय, फेफड़े, जिगर, गुर्दे, आँतें आदि सक्रिय हो जाते हैं। शरीर की सभी कार्य-प्रणालियाँ — श्वसन, पाचन, निष्कासन, रक्तभ्रमण, स्नायु-तंत्र, ग्रंथि, अस्थि, प्रजनन तथा माँसपेशियाँ — सुदृढ़ व सक्रिय हो जाती हैं। फलस्वरूप, मस्तिष्क को भरपूर मात्रा में ऑक्सीजन युक्त रक्त की आपूर्ति होती है और स्मरण-शक्ति का विकास होता है। मस्तिष्क को प्रचुर मात्रा में रक्त देने वाले मुख्य आसन हैं — सर्वांगासन, विपरीतकरणी, शवासन, हलासन, पश्चिमोत्तानासन, पद्मासन, शशकासन, सूर्य नमस्कार की पाँचवीं, छठी व आठवीं स्थिति। जब मनुष्य का शरीर रोगी होता है तो उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और बुद्धि का समुचित विकास नहीं हो पाता। आसन शरीर को रोगमुक्त करके बुद्धि विकास में सहायक बनते हैं।

बुद्धि विकास में प्राणायाम की विशिष्ट भूमिका है। प्राणायाम के अभ्यास से समस्त शरीर में प्राणों का समान रूप से वितरण होता है, जिससे शुद्ध ऑक्सीजन युक्त रक्त मस्तिष्क में जाने को बाध्य होता है। गहरे श्वासों के अभ्यास से मस्तिष्क की तनावपूर्ण स्थिति समाप्त होती है, सभी तंतु शिथिल होते हैं तथा शांत भाव को प्राप्त होते हैं। तनावग्रस्त व्यक्ति की बुद्धि ठीक निर्णय नहीं ले पाती। तनावग्रस्त व्यक्ति के मस्तिष्क में न्यूरॉन्स का क्षय सामान्य से अधिक मात्रा में होता है तथा व्यक्ति असामयिक मृत्यु का शिकार हो जाता है। स्मृति व बुद्धि विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कपालभाति प्राणायाम है। इसके अभ्यास से, मस्तिष्क में स्थित मूर्धा नाड़ी भी सक्रिय हो जाती है, जिससे मस्तिष्क की सुप्त शक्तियाँ जागृत हो जाती हैं तथा व्यक्ति विलक्षण प्रतिभा का धनी बन जाता है। स्मरण-शक्ति को बढ़ाने में कपालभाति बेजोड़ अभ्यास है। भ्रामरी, उज्जायी तथा नाड़ी शोधन व भस्त्रिका प्राणायाम भी अत्यन्त गुणकारी हैं। प्राणायाम अभ्यास के समय मूलबंध, उड्डियान बंध व जालंधर बंध सहित कुम्भक का अभ्यास करने पर प्राण, मन, वीर्य व वृत्ति की गति ऊपर की ओर होने से ये सभी ऊर्ध्वगामी हो जाते हैं, जिससे बुद्धि का अत्यधिक विकास होता है।

प्रत्याहार के अभ्यास से हमारी इन्द्रियाँ अन्तर्मुखी होती हैं, जिससे हमारी आंतरिक ऊर्जा का निरर्थक व्यय, सांसारिक व विषय वासनाओं में, नहीं होता तथा यह ऊर्जा स्मृति व बुद्धि विकास में उपयोगी बनती है।

धारणा का अभ्यास हमारी एकाग्रता (concentration) को अत्यधिक बढ़ाता है, जिससे स्मृति बढ़ती है और जीवन के हर कार्य में सफलता मिलती है। एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है।

ध्यान स्मरण-शक्ति व बुद्धि विकास का सर्वोत्तम उपाय है। ध्यान ही अपने भीतर स्थायी शांति को खोजने का सहज मार्ग है। ध्यान करना कोई मुश्किल कार्य नहीं है। गुरु गोरखनाथ जी ने कहा है, “हसिबा, खेलिबा करिये ध्यानम्।” वास्तव में ध्यान ही योग है। ध्यान से हमें परम शांति, परम ज्ञान व परमानन्द की प्राप्ति होती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, चिंता, राग, द्वेष, भय, हिंसा, घृणा, निराशा, अपमान, क्लेश आदि के कारण हमारा मस्तिष्क मलिन होता रहता है। इन सबका गंदगुबार वहाँ जमा होता रहता है। ये सारे के सारे दूषित संस्कार ध्यान की प्रक्रिया से नष्ट हो जाते हैं। मस्तिष्क में अल्फा तरंगें प्रवाहित होने लगती हैं और हमारी बुद्धि का अलौकिक विकास संभव होता है। हमारे भीतर नवनिर्माण व शुभ सृजन की इच्छा प्रबल हो जाती है। एकाग्रता, जागरूकता, इच्छा-शक्ति, अवलोकन शक्ति, कल्पना शक्ति की वृद्धि हो जाती है। मस्तिष्क में स्थित आज्ञा चक्र व सहस्रार चक्र जागृत होने लगते हैं, जिससे ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं। मानव ‘सर्वभूते हिते रतः’ की स्थिति में आ जाता है।

स्मरण-शक्ति व बुद्धि विकास में सात्त्विक भोजन ग्रहण करना व मिताहारी होना भी अत्यन्त लाभप्रद है।

मौन साधना तथा यम-नियमों का पालन विशेषकर सत्य, संतोष, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान हमारी बुद्धि को ऋतम्भरा बनाने में सहायक हैं। ॐ या प्रणव का जाप तथा गायत्री मंत्र का जाप बुद्धि के विकास में चमत्कारिक प्रभाव दिखाता है। वैज्ञानिक परीक्षणों ने सिद्ध किया है कि ये शक्तियाँ जागृत करने में सक्षम हैं। स्वामी श्रद्धानंद बचपन में पढ़ने में बहुत कमजोर थे। एक महात्मा ने उन्हें गायत्री मंत्र सिखाकर जपने के लिए कहा, जिसके बाद वे अपनी कक्षा में प्रथम आए।

अंत में हमें एक और तथ्य भी ध्यान रखना है। कार्य की बहुत अधिकता से भी स्मरण-शक्ति का ह्रास होता है। यदि मैं जीवन की सारी बातों को एक साथ याद रखूँ तो पागल हो जाऊँगा। जीवन के कटु अनुभवों, प्रियजनों की मृत्यु, आकस्मिक दुर्घटनाएँ, आकस्मिक नुकसान आदि को निरंतर याद रखने से हमारे जीवन का चलना दूभर हो जाएगा। हमारी उन्नति रुक जाएगी। हमें किसी भी क्रिया में संलग्न होना तो बहुत आता है, पर उससे अलग होना नहीं आता। योग हमें यह तकनीक सिखाता है। इस स्थिति से उबरने के लिए प्रभु ने हमें भूलने का गुण दिया है। इस प्रकार भूलना भी स्मृति के लिए एक विशिष्ट गुण है।

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