योगिक अथवा वैज्ञानिक मालिश: शरीर के सभी अंगों की क्रियाशीलता एवं स्वास्थ्य इन अंगों को प्रचुर मात्रा में शुद्ध रक्त (Oxygenated Blood) की आपूर्ति पर निर्भर है। सभी शारीरिक, मानसिक, ऐच्छिक एवं अनैच्छिक क्रियाओं के माध्यम से हमारा रक्त अशुद्ध होता रहता है तथा शरीर में इसका निरंतर शोधन भी होता रहता है। शरीर में मुख्यतः तीन प्रणालियों के माध्यम से रक्त का शोधन होता है। ये हैं – फेफड़े, गुर्दे एवं त्वचा।
योगिक अथवा वैज्ञानिक मालिश: Yogic or Scientific Massage
जब हम श्वास लेते हैं तो वायु हमारे फेफड़ों में जाती है। हृदय के द्वारा फेफड़ों में भेजे गए अशुद्ध रक्त का सम्पर्क वहाँ के प्रचुर ऑक्सीजन से होता है। ऑक्सीजन की प्रक्रिया से रक्त की अशुद्धियाँ कार्बन डाइऑक्साइड में बदल जाती हैं तथा प्रश्वास के द्वारा शरीर से बाहर निकल जाती हैं। शुद्ध रक्त हृदय के पास भेज दिया जाता है। हृदय उसे सारे शरीर को भेजता है।
इसी प्रकार हमारे गुर्दे निरंतर रक्त को छानते रहते हैं। उसमें उपस्थित यूरिया, यूरिक एसिड तथा अन्य हानिकारक पदार्थों को रक्त से अलग करके मूत्राशय में भेज देते हैं, जहाँ से मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिए जाते हैं।
रक्त शोधन का तीसरा मार्ग त्वचा है। हमारी त्वचा पर असंख्य छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें रोम छिद्र भी कहा जाता है। इन छिद्रों के माध्यम से भी शरीर में वायु प्रवेश करती रहती है तथा प्रत्येक कोशिका में उपस्थित रक्त का शोधन अल्प मात्रा में वहीं पर होता रहता है। इन रोमछिद्रों के माध्यम से शरीर के विषैले तत्त्व (Toxins) भी पसीने के रूप में शरीर से बाहर निकलते हैं।
मालिश के लाभ:
मालिश एक ऐसी प्रक्रिया है जो रोमछिद्रों को अधिकाधिक मात्रा में सक्रिय बनाकर रक्त शोधन में सहायता प्रदान करती है। आयुर्वेद के अनुसार, नियमित तेल मालिश से कुपित हुए वात व कफ की प्रकृति को शांत किया जा सकता है। नींद अच्छी आती है। अंगों में कमज़ोरी आने से बुढ़ापा दूर रहता है। शरीर की त्वचा कांतिमय बनती है। दृष्टि (Eye-sight) अच्छी बनती है। शिराओं (Veins) में रक्त संचार तीव्र होता है। हमारे शरीर में बचा के नीचे की सतह पर शिराएँ होती हैं और उनसे अन्दर की (नीचे की) सतह पर धमनियाँ (Arteries) होती हैं।
शिराओं के माध्यम से दूषित रक्त हृदय तक पहुँचता है, इसलिए मालिश की दिशा विभिन्न अंगों से हृदय की ओर होनी चाहिए। मालिश से लसिका (लिम्फेटिक) तंत्र की गति तीव्र होती है, जिससे शरीर के दूषित तत्त्वों का निष्कासन बढ़ता है। आँखों की पेशियाँ सशक्त बनती हैं। स्त्रियों के स्तनों की मालिश से उनमें कसाव आता है और दूध की वृद्धि होती है। हड्डियों व जोड़ों की कलियों की मालिश विशेष लाभदायक है। लगभग ९१ प्रकार की मालिश होती है।
मालिश की विधियाँ:
- घर्षण: सूखे तौलिये या हथेली से घर्षण द्वारा मालिश करना।
- दलन: धीरे-धीरे हाथ से दबाते हुए मालिश करना।
- सिहरन: शरीर को उँगलियों के पोरों से तरंगित करना (Vibrations)।
- थपकी: थपथपाना।
- चुटकी: शरीर पर धीरे-धीरे चुटकी काटते हुए आगे बढ़ना।
- बेलना: दोनों हथेलियों से मांसपेशियों को बेलना।
- उँगलियों के पोरों से मालिश।
- मरोड़ना: मांसपेशियों को मरोड़ते हुए मालिश करना। आदि कई प्रकार की मालिश होती है।
सारे शरीर की मालिश में लगभग 50 मिनट लगते हैं। पैरों की मालिश में 14 मिनट, हाथों की 8 मिनट, पीठ की 8 मिनट, गले की 2 मिनट, चेहरे तथा कान की 6 मिनट, सिर में 3 मिनट, छाती व पेट तथा पसलियों के बीच-बीच की जगह की 9 मिनट।
शरीर के विभिन्न भागों की मालिश निम्न प्रकार करें:
- सिर की मालिश: उँगलियों के पोरों से करें। कपाल को हथेली का कप बनाकर 15 – 20 बार थपथपाएँ।
- कानों की मालिश: कानों के पीछे भाग में नसों के कम्पन होते हैं। उसके साथ गर्दन के दोनों साइड की नसों की दोनों हाथों की दो-दो उँगलियों के बीच में कान को रखकर 20 – 25 बार आगे-पीछे व ऊपर-नीचे मलें। धीरे-धीरे।
- तर्जनी व अनामिका कान के छिद्र पर रखकर 10 – 15 बार घुमाएँ।
- चारों Sinus Cavities अर्थात Frontal, Maxillary, Ethmoid व Sphenoid की मालिश करें। माथे के मध्य से बाहर की ओर, भौंहों के ऊपर व नीचे बाहर की ओर तथा नासिका के दोनों तरफ ऊपर से नीचे की ओर हल्के-हल्के मलें।
- गले की मालिश: दाएँ, बाएँ तथा मध्य में ऊपर से नीचे की ओर करें। गर्दन की मालिश ऊपर से नीचे की ओर करें।
- हाथों की मालिश: उँगलियों से कंधों की ओर तथा हथेलियों व उँगलियों के बीच के भाग में मलें। कोहनियों व कंधों के जोड़ों की चारों ओर घुमावदार मालिश करें।
- पैरों की मालिश: नीचे से ऊपर की ओर तथा पैर के पिछले तरफ के भाग पर तथा उँगलियों के मध्य में तथा तलवों की मालिश करें।
- घुटनों की मालिश: दोनों हाथों की चारों उँगलियों से घुटने के नीचे से दोनों तरफ से दबाव हुए बारंबार ऊपर लाएँ। घुटने की टोपी के चारों ओर किनारों पर Clockwise व Anti-clockwise मालिश करें।
- सामान्यतः पेट की मालिश नहीं करें। यदि करनी ही हो तो खाली पेट नाभि के चारों ओर Clockwise व Anti-clockwise मालिश करें।
- रीढ़ की मालिश: ऊपर से नीचे तक किसी दूसरे से करवाएँ। गट्टियों के बीच की गद्दियों (Disc) की बाहर की ओर मालिश करें। गट्टियाँ (Vertaebra) को न दबाएँ।
- छोटे बच्चों की मालिश जैतून (Olive Oil) के तेल से करें।
- सभी जोड़ों (Joints) की मालिश के बाद उन्हें movement जरूर दें।
- स्नायु दुर्बल्य में रीढ़ की मालिश करें।
- अनिद्रा में रीढ़ व तलवों की मालिश करें।
- टॉन्सिल की परेशानी में गले व गर्दन की मालिश करें।
- अस्थमा में रीढ़ व छाती की मालिश करें।
- सायटिका में एड़ी से कूल्हे तक की मालिश करें।
- वेरिकोज़ वेन्स में एड़ी से जंघाओं तक की मालिश करें।
- कब्ज में छोटी व बड़ी आँतों की मालिश करें।
- सिर दर्द में सिर, माथा व गर्दन की मालिश करें।
सावधानियाँ:
मालिश के संबंध में एक विशेष बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि मालिश स्वयं अपने हाथों से या अपने किसी निकट के परिवारजन से ही करवानी चाहिए। पेशेवर (Professional) मालिशियों से मालिश नहीं करवानी चाहिए क्योंकि वे अनेक लोगों की मालिश करते हैं। किसी भी चर्मरोग (Skin Disease) वाले के कीटाणु हमारे शरीर में पहुँच सकते हैं। ऐसे लोग स्वयं भी किसी प्रकार के रोग से संक्रमित होने पर भी पैसों के लोभवश अपने पेशे को नहीं छोड़ते तथा दूसरों को भी संक्रमित कर देते हैं।
दूसरी ओर, अपने परिवार के व्यक्ति का यह भाव कि मालिश के द्वारा हम रोगमुक्त हों और हमारा शरीर स्वस्थ बने, बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पेशेवर मालिश करने वालों को तो केवल पैसे से मतलब होता है।
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