जिस प्रकार विभिन्न नदियाँ आपस में मिलकर अंत में समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी प्रकार, योग की विभिन्न विधियाँ, जैसे भक्ति योग, कर्म योग, ज्ञान योग, राज योग, मंत्र योग व हठ योग आदि का शारीरिक व मानसिक उद्देश्य भी मोक्ष को प्राप्त करना है। पर योग के साधक को साधना करते हुए विभिन्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है। अतः साधना के मार्ग पर उसे आगे बढ़ने के लिए इन बाधाओं की जानकारी होना आवश्यक है। इसके साथ-साथ उन बाधाओं को कैसे दूर किया जाए—इसका भी उसे अच्छे-से ज्ञान होना चाहिए। योग के मार्ग पर आने वाली इन बाधाओं को व उनके समाधान को हम योग के बाधक व साधक तत्त्व कहते हैं।
योग के बाधक व साधक तत्त्व: Factors Hindering & Facilitating Yoga
स्वामी स्वात्माराम द्वारा ‘हठ प्रदीपिका’ के प्रथम उपदेश के सूत्र 15 व 16 में योग के बाधक व साधक तत्त्वों को स्पष्ट किया गया है:
अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः।
जनसंगश्च लौल्यं च षड्भिर्योगो विनश्यति।।
(ह.प्र. सूत्र–13)
अर्थात् अधिक भोजन, अधिक प्रयास, अधिक बोलना, अधिक नियमाग्रह, अधिक लोक सम्पर्क व मन की चंचलता साधना के मार्ग में बाधक हैं।
- अति आहार – अति आहार से शरीर में पाचन व पेट संबंधी रोग उत्पन्न होने से शरीर रोगी बनता है, जिससे साधना के मार्ग में बाधा आती है।
- अति प्रयास – जब कोई व्यक्ति जीवन में क्षमता से अधिक प्रयास करता है तो उसमें रजस व तमस गुणों की वृद्धि होने लगती है, जिससे जीवन में शारीरिक व मानसिक असंतुलन पैदा होने लगता है। इससे उसके साधना के मार्ग में बाधा आने लगती है।
- प्रजल्प – जब व्यक्ति अनावश्यक व अधिक बोलता है तो उसमें नकारात्मक वृत्ति जन्म लेने लगती है। ये नकारात्मक वृत्तियाँ साधना के मार्ग में बाधक बनती हैं।
- नियमाग्रह – जब जीवन में सामाजिक व धार्मिक मान्यताओं की सीमा को पार करके उनका अधिक सख्ती से पालन किया जाता है तो वे साधना में बाधा का कार्य करने लगती हैं – जैसे सर्दी के मौसम में अति ठण्डे पानी से स्नान करना।
- जन संग – जन संग का अर्थ है अधिक लोक सम्पर्क करना। अधिक लोक सम्पर्क करने से शारीरिक व मानसिक ऊर्जा का अधिक ह्रास होता है तथा नोक-झोंक व मतभेद होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे मन अस्थिर होता है और यह साधना के मार्ग में एक बाधा बन जाती है।
- चंचलता – जब मन अधिक बहिर्मुखी होता है तो चंचलता का स्तर भी शिखर पर होता है। इससे जीवन में ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह जैसे दोष आने लगते हैं। इस प्रकार, मानसिक चंचलता साधना के मार्ग में एक बाधक तत्त्व का कार्य करती है।
योग के साधक तत्त्व
‘हठ प्रदीपिका’ के प्रथम उपदेश के सूत्र–16 के अनुसार:
उत्साहात् साहसाद्धैर्यात्तत्त्वज्ञानाच्च निश्चयात्।
जनसंगपरित्यागात् षड्भिर्योगः प्रसिद्ध्यति।।
उत्साह, साहस, धैर्य, यथार्थ ज्ञान, संकल्प व जन संग परित्याग – ये योग के छह साधक तत्त्व हैं, जिनका अनुसरण करने से साधक योग में सिद्धि को प्राप्त करता है।
- उत्साह – शरीर, मन व इंद्रियों की उत्साह के साथ साधना करना प्रेरणा का स्रोत बनता है। अतः साधक को साधना के मार्ग पर उत्साह के साथ ही आगे बढ़ना चाहिए।
- साहस – योग की कठिन क्रियाओं, जैसे दण्ड धौती, शंख प्रक्षालन, खेचरी मुद्रा आदि को योग गुरु के मार्ग-दर्शन में साहस के साथ सीखने में सफलता सहज रूप से प्राप्त होती है। साहसी साधक योग की कठिन क्रियाओं को सहजता से करके साधना में आगे बढ़ता है।
- धैर्य – जो साधक योग में शीघ्रता से सफलता प्राप्त करना चाहता है, उसे सफलता नहीं मिल पाती, जिससे वह अधर में मार्ग भटक जाता है। लेकिन जो साधक धैर्य रखता है, वह धीरे-धीरे सफलता को प्राप्त करता है। धैर्य साधना के मार्ग में आने वाली बाधाओं को पार करने की अमूल्य कुंजी है।
- तत्त्व ज्ञान – योग को सिद्ध करने के लिए साधक को साधना के मार्ग का यथार्थ ज्ञान कराने वाले उचित शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए। अनुभवी व निपुण योग गुरु के सानिध्य में रहकर ही तत्त्व ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
- संकल्प – योग सिद्धि के लिए दृढ़ संकल्प ही साधक को योग के लक्ष्य तक लेकर जाता है। यदि संकल्प में ढील दी जाती है तो मार्ग अवश्य ही बाधित हो जाएगा। इसलिए साधक को योग के मार्ग पर दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
- जन संग परित्याग – यह सत्य है कि हम जितना अधिक लोक सम्पर्क करते हैं, उतनी ही हमारी मानसिक बहिर्मुखता बढ़ती है। अतः एक योगी को योग सिद्धि के लिए यथासंभव लोक सम्पर्क को कम करना चाहिए। ऐसा करने से साधक में अन्तर्मुखता का स्तर बढ़ता है, जो उसे योग की लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होता है।
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