फूल से बोली कली‚ क्यों व्यस्त मुरझाने में है फायदा क्या गंध औ’ मकरंद बिखराने में है तू स्वयं को बांटता है‚ जिस घड़ी से तू खिला किंतु इस उपकार के बदले में तुझको क्या मिला देख मुझको‚ सब मेरी खुशबू मुझी में बंद है मेरी सुंदरता है अक्षय‚ अनछुआ मकरंद है मैं किसी लोलुप भ्रमर के जाल में फंसती …
Read More »परदेसी को पत्र – त्रिलोचन
सोसती सर्व उपमा जोग बाबू रामदास को लिखा गनेसदास का नाम बाँचना। छोटे बड़े का सलाम आसिरवाद जथा उचित पहुँचे। आगे यहाँ कुसल है तुम्हारी कुसल काली जी से दिन रात मनाती हूँ। वह जो अमौला तुमने धरा था द्वार पर अब बड़ा हो गया है। खूब घनी छाया है। भौंरौं की बहार है। सुकाल ऐसा ही रहा तो फल …
Read More »हरी तुम हरो जन की भीर – मीरा बाई
द्रौपदी की लाज राखी‚ तुरत बढ़ायो चीर। भक्त कारण रूप नरहरी‚ धर्यो आप सरीर। हिरनकुश मारि लीन्हों‚ धर्यो नाहिन धीर। हरी तुम हरो जन की भीर। बूड़तो गजरात राख्यौ‚ कियौ बाहर नीर। दासी मीरा लाल गिरधर‚ चरण कंवल पर सीर। हरी तुम हरो जन की भीर। ~ मीरा बाई
Read More »पायो जी मैंने‚ राम रतन धन पायो – मीरा बाई
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु किरपा कर अपणायो पायो जी मैंने‚ राम रतन धन पायो जनम–जनम की पूँजी पाई जग में सबै खोबायो खरचे नहीं‚ कोई चोर न लेवै दिन–दिन बढ़त सवायौ पायो जी मैंने‚ राम रतन धन पायो सत की नाव‚ खेवटिया सतगुरु भव सागर तरि आयौ मीरा के प्रभु गिरधर नागर हरिख–हरिख जस गायौ पायो जी मैंने‚ राम …
Read More »दाढ़ी महिमा – काका हाथरसी
‘काका’ दाढ़ी राखिए, बिन दाढ़ी मुख सून ज्यों मंसूरी के बिना, व्यर्थ देहरादून व्यर्थ देहरादून, इसी से नर की शोभा दाढ़ी से ही प्रगति कर गए संत बिनोवा मुनि वसिष्ठ यदि दाढ़ी मुंह पर नहीं रखाते तो भगवान राम के क्या वे गुरू बन जाते? शेक्सपियर, बर्नार्ड शॉ, टाल्सटॉय, टैगोर लेनिन, लिंकन बन गए जनता के सिरमौर जनता के सिरमौर, …
Read More »पड़ोस – ऋतुराज
कोयलों ने क्यों पसंद किया हमारा ही पेड़? बुलबुलें हर मौसम में क्यों इसी पर बैठी रहती हैं? क्यों गौरैयों के बच्चे हो रहे हैं बेशुमार? क्यों गिलहरी को इसपर से उतरकर छत पर चक्कर काटना अच्छा लगता है? क्यों गिरगिट सोया रहता है यहाँ? शायद इन मुफ्त के किराएदारों को हमारा पड़ोस अच्छा लगता है वे देखते होंगे कि …
Read More »जिंदगी – बुद्धिनाथ मिश्रा
जिंदगी अभिशाप भी, वरदान भी जिंदगी दुख में पला अरमान भी क़र्ज साँसों का चुकाती जा रही जिंदगी है मौत पर अहसान भी। वे जिन्हें सर पर उठाया वक्त ने भावना की अनसुनी आवाज थे बादलों में घर बसाने के लिये चंद तिनके ले उड़े परवाज थे दब गये इतिहास के पन्नों तले तितलियों के पंख, नन्ही जान भी। कौन …
Read More »निदा फ़ाज़ली के दोहे
युग युग से हर बाग का, ये ही एक उसूल जिसको हँसना आ गया, वो ही मट्टी फूल। पंछी, मानव, फूल, जल, अलग–अलग आकार माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार। बच्चा बोला देख कर, मस्जिद आलीशान अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान। अन्दर मूरत पर चढ़े घी, पूरी, मिष्टान मंदिर के बाहर खड़ा, ईश्वर माँगे दान। आँगन–आँगन बेटियाँ, …
Read More »पुराने पत्र – रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’
हर पुराना पत्र सौ–सौ यादगारों का पिटारा खोलता है। मीत कोई दूर का, बिछड़ा हुआ सा, पास आता है, लिपटता, बोलता है। कान में कुछ फुसफुसाता है, हृदय का भेद कोई खोलता है। हर पुरान पत्र है इतिहास आँसू या हँसी का चाँदनी की झिलमिलाहट या अन्धेरे की घड़ी का आस का, विश्वास का, या आदमी की बेबसी का। ये …
Read More »नखरे सलाई के – दिनेश प्रभात
आ गये दिन लौट कर, कंबल रज़ाई के। सज गये दूकान पर फिर ऊन के गोले, पत्नियों के हाथ में टंगने लगे झोले, देखने लायक हुए नखरे सलाई के। धूप पाकर यूं लगा, ज्यों मिल गई नानी, और पापा–सा लगा, प्रिय गुनगुना पानी, हो गये चूल्हे, कटोरे रसमलाई के। ले लिया बैराग मलमल और खादी ने, डांट की चाबुक थमा …
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