जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए‚ विश्व की पहचान लेकर क्या करूं? जब न तुम से स्नेह के दो कण मिले‚ व्यथा कहने के लिये दो क्षण मिले। जब तुम्हीं ने की सतत अवहेलना‚ विश्व का सम्मान लेकर क्या करूं? जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए‚ विश्व की पहचान लेकर क्या करूं? एक आशा एक ही अरमान था‚ …
Read More »निष्क्रियता – राजीव कृष्ण सक्सेना
कहां तो सत्य की जय का ध्वजारोहण किया था‚ कहां अन्याय से नित जूझने का प्रण लिया था‚ बुराई को मिटाने के अदम उत्साह को ले‚ तिमिर को दूर करने का तुमुल घोषण किया था। बंधी इन मुठ्ठियों में क्यों शिथिलता आ रही है? ये क्यों अब हाथ से तलवार फिसली जा रही है? निकल तरकश से रिपुदल पर बरसने …
Read More »मदारी का वादा – राजीव कृष्ण सक्सेना
बहुत तेज गर्मी है आजा सुस्ता लें कुछ पीपल की छैयां में पसीना सुख लें कुछ थका हुआ लगता है मुझे आज बेटा तू बोल नहीं सकता पर नहीं छुपा मुझसे कुछ कितनी ही गलियों में कितने चुबारों में दिखलाया खेल आज कितने बाज़ारों में कितनी ही जगह आज डमरू डम डम बोला बंसी की धुन के संग घुमा तू …
Read More »जीवन की ही जय है – मैथिली शरण गुप्त
मृषा मृत्यु का भय है जीवन की ही जय है जीव की जड़ जमा रहा है नित नव वैभव कमा रहा है पिता पुत्र में समा रहा है यह आत्मा अक्षय है जीवन की ही जय है नया जन्म ही जग पाता है मरण मूढ़-सा रह जाता है एक बीज सौ उपजाता है सृष्टा बड़ा सदय है जीवन की ही …
Read More »दुनिया एक खिलौना – निदा फ़ाज़ली
दुनिया जिसे कहते हैं‚ जादू का खिलौना है मिल जाए तो मिट्टी है‚ खो जाए तो सोना है। अच्छा सा कोई मौसम‚ तन्हा सा कोई आलम हर वक्त का रोना तो‚ बेकार का रोना है। बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने किस रााह से बचना है, किस छत को भिगोना है। ग़मा हो या खुशी दोनो कुछ देर …
Read More »दिवंगत मां के नाम पत्र – अशोक वाजपेयी
व्यर्थ के कामकाज में उलझे होने से देर हो गई थी और मैं अंतिम क्षण तुम्हारे पास नहीं पहुँच पाया था! तुम्हें पता नहीं उस क्षण सब कुछ से विदा लेते मुझ अनुपस्थित से भी विदा लेना याद रहा कि नहीं जीवन ने बहुत अपमान दिया था पर कैंसर से मृत्यु ने भी पता नहीं क्यों तुम्हारी लाज नहीं रखी …
Read More »धूप की चादर – दुष्यंत कुमार
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए, कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए। जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा, बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए। खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को, अब अपनी–अपनी हथेली जला के बैठ गए। दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो, तमाशबीन दुकानें लगा के …
Read More »चल मियाँ – जेमिनी हरियाणवी
आज कल पड़ती नहीं है कल मियाँ छोड़ कर दुनियां कहीं अब चल मियाँ रात बिजली ने परेशां कर दिया सुबह धोखा दे गया है नल मियाँ लग रही है आग देखे जाइये पास तेरे जल नहीं तो जल मियाँ लाख वे उजले बने फिरते रहें कोठरी में उनके है काजल मियाँ आज ये दल कल नया परसों नया देश …
Read More »उत्तर न होगा वह – बालकृष्ण राव
कोई दुख नया नहीं है सच मानो, कुछ भी नहीं है नया कोई टीस, कोई व्यथा, कोई दाह कुछ भी, कुछ भी तो नहीं हुआ। फिर भी न जाने क्यों उठती–सी लगती है अंतर से एक आह जाने क्यों लगता है थोड़ी देर और यदि ऐसे ही पूछते रहोगे तुम छलक पड़ेगा मेरी आँखों से अनायास प्रश्न ही तुम्हारा यह …
Read More »सुदामा चरित – नरोत्तम दास
ज्ञान के सामने धन की महत्वहीनता सुदाम पत्नी को बताते हैंः सिच्छक हौं सिगरे जग के तिय‚ ताको कहां अब देति है सिच्छा। जे तप कै परलोक सुधारत‚ संपति की तिनके नहि इच्छा। मेरे हिये हरि के पद–पंकज‚ बार हजार लै देखि परिच्छा औरन को धन चाहिये बावरि‚ ब्राह्मन को धन केवल भिच्छा सुदामा पत्नी अपनी गरीबी बखानती हैः कोदों …
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