Poems In Hindi

बच्चों की हिन्दी कविताएं — 4to40 का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children. पढ़िए कुछ मजेदार, चुलबुली, नन्ही और बड़ी हिंदी कविताएँ. इस संग्रह में आप को बच्चो और बड़ो के लिए ढेर सारी कविताएँ मिलेंगी.

परिवर्तन – ठाकुर गोपालशरण सिंह Poetry about Changes in Life

परिवर्तन - ठाकुर गोपालशरण सिंह Poetry about Changes in Life

देखो यह जग का परिवर्तन जिन कलियों को खिलते देखा मृदु मारुत में हिलते देखा प्रिय मधुपों से मिलते देखा हो गया उन्हीं का आज दलन देखो यह जग का परिवर्तन रहती थी नित्य बहार जहाँ बहती थी रस की धार जहाँ था सुषमा का संसार जहाँ है वहाँ आज बस ऊजड़ बन देखो यह जग का परिवर्तन था अतुल …

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काका और मच्छर – काका हाथरसी Hindi Poem on Mosquitoes

काका और मच्छर - काका हाथरसी Hindi Poem on Mosquitoes

काका वेटिंग रूम में, फँसे देहरा–दून नींद न आई रात भर, मच्छर चूसें खून मच्छर चूसें खून, देह घायल कर डाली हमें उड़ा ले जाने की योजना बना ली किंतु बच गये कैसे, यह बतलाएँ तुमको? नीचे खटमल जी ने पकड़ रखा था हमको! हुई विकट रस्साकशी, थके नहीं रणधीर ऊपर मच्छर खींचते, नीचे खटमल वीर नीचे खटमल वीर, जान …

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माँ कह एक कहानी – मैथिली शरण गुप्त – Inspirational Bedtime Poem

माँ कह एक कहानी - मैथिली शरण गुप्त - Inspirational Bedtime Poem

“माँ कह एक कहानी।” बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी? “कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी? माँ कह एक कहानी।” “तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे, तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।” “जहाँ सुरभी मनमानी। हाँ माँ यही …

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साकेत: कैकेयी का पश्चाताप – मैथिली शरण गुप्त – Kaikeyi’s Remorse

साकेत: कैकेयी का पश्चाताप - मैथिली शरण गुप्त - Kaikeyi's Remorse

“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।” चौंके सब सुनकर अटल कैकेयी स्वर को। बैठी थी अचल तदापि असंख्यतरंगा, वह सिन्हनी अब थी हहा गोमुखी गंगा। “हाँ, जानकर भी मैंने न भरत को जाना, सब सुनलें तुमने स्वयम अभी यह माना। यह सच है तो घर लौट चलो तुम भैय्या, अपराधिन मैं हूँ तात्, तुम्हारी मैय्या।” “यदि …

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दयालु कौन – Short Hindi Poem about Kindness

दयालु कौन - Short Hindi Poem about Kindness

(१) देख पराया दुःख, ह्रदय जिसका अति व्याकुल हो जाता। जब तक दुःख न मिटता, तब तक नही चैन जो है पाता।। पर दुःख हरने को जो सुख से निज सुख देकर सुख पाता। करुणा सागर का सेवक वह, दयालु जग में कहलाता।। (२) शत्रु-मित्र निज-परमे कोई भी जो भेद नही करता। दुःखी मात्र के दुःख से दुःखी हो, जो …

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पानी – ओमप्रकाश बजाज Hindi Poem on Importance of Water

पानी - ओमप्रकाश बजाज Hindi Poem on Importance of Water

पानी अपना रास्ता स्वयं बनाता है, हमेशा ढलान की ओर जाता है। बहता पानी निर्मल शुद्ध रहता है, खड़ा हुआ पानी सड़ जाता है। पानी का तेज बहाव अपने साथ, बड़े-बड़े पत्थर, पेड़ बहा ले जाता है। मीठा पानी पीने के काम आता है, शहरों में नलों से पहुंचाया जाता है। वर्षा ऋतु में नदियों में बाढ़ आती है, तबाही …

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जागो देश वासियों – आद्विक मिश्रा – Motivational Short Hindi Poetry for Countrymen

जागो देश वासियों - आद्विक मिश्रा - Motivational Short Hindi Poetry for Countrymen

ओ! भारत के देश वासियों, कुछ काम कर के दिखलाना है, इस भारत को प्यार से हरा-भरा बनाना है। अस्त्र-शस्त्र को छोड़कर अहिंसा को अपनाया है। ओ! भारत के देश वासियों, कुछ काम कर के दिखलाना है, झुग्गी-झोंपड़ी वालो को पक्का घर दिलवाना हैं। भारत की इस गरीबी को, जड़ से हमे मिटाना है। स्वचछता की ओर हर एक को …

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मधु की रात – चिरंजीत

मधु की रात – चिरंजीत

अलक सन्धया ने सँवारी है अभी म्यान में चन्दा कटारी है अभी चम्पई रंग पे न आ पाया निखार रात यह मधु की, कुंआरी है अभी। चाँदनी की डगर पर तुम साथ हो प्राण युग–युग तक अमर यह रात हो कल हलाहल ही पिला देना मुझे आज मधु की रात, मधु की बात हो। क्या सितारों के इशारे, ध्यान दो …

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पहली कोशिश – राज नारायण बिसारिया

पहली कोशिश – राज नारायण बिसारिया

जिधर तुम जा रहीं थीं उस तरफ मुझको न जाना था बनाया साथ पाने के लिये झूठा बहाना था न कुछ सोचा विचारा था कि क्या कहना–कहाना था मुझे तो बस अकेले साथ में चलना–चलाना था! रुकीं दो पल चले दोनों सभी कुछ तो सुहाना था मगर बतिया नहीं पाए कि चुप्पी का ज़माना था! बहुत धीमे कहा कुछ था …

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राष्ट्र की रपट – आचार्य भगवत दूबे

राष्ट्र की रपट – आचार्य भगवत दूबे

नेतृत्व गया है भटह बंधु क्या लिखूँ राष्ट्र की रपट बंधु कशमीर, आंध्र, आसाम सहित जलते हैं केरल, कटक बंधु सूखे चेहरे कुटियाओं के महलों की रंगत चटक बंधु हथकड़ी नोट से कट जाती कैदी जातें हैं सटक बंधु अपराधी छूटें, निरपराध फाँसी पर जाते लटक बंधु सौ रुपय लोक–हित जो भेजे पच्चासी जाते अटक बंधु जो नहर बांध से …

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