कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए, कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए। जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा, बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए। खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को, अब अपनी–अपनी हथेली जला के बैठ गए। दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो, तमाशबीन दुकानें लगा के …
Read More »चल मियाँ – जेमिनी हरियाणवी
आज कल पड़ती नहीं है कल मियाँ छोड़ कर दुनियां कहीं अब चल मियाँ रात बिजली ने परेशां कर दिया सुबह धोखा दे गया है नल मियाँ लग रही है आग देखे जाइये पास तेरे जल नहीं तो जल मियाँ लाख वे उजले बने फिरते रहें कोठरी में उनके है काजल मियाँ आज ये दल कल नया परसों नया देश …
Read More »उत्तर न होगा वह – बालकृष्ण राव
कोई दुख नया नहीं है सच मानो, कुछ भी नहीं है नया कोई टीस, कोई व्यथा, कोई दाह कुछ भी, कुछ भी तो नहीं हुआ। फिर भी न जाने क्यों उठती–सी लगती है अंतर से एक आह जाने क्यों लगता है थोड़ी देर और यदि ऐसे ही पूछते रहोगे तुम छलक पड़ेगा मेरी आँखों से अनायास प्रश्न ही तुम्हारा यह …
Read More »सुदामा चरित – नरोत्तम दास
ज्ञान के सामने धन की महत्वहीनता सुदाम पत्नी को बताते हैंः सिच्छक हौं सिगरे जग के तिय‚ ताको कहां अब देति है सिच्छा। जे तप कै परलोक सुधारत‚ संपति की तिनके नहि इच्छा। मेरे हिये हरि के पद–पंकज‚ बार हजार लै देखि परिच्छा औरन को धन चाहिये बावरि‚ ब्राह्मन को धन केवल भिच्छा सुदामा पत्नी अपनी गरीबी बखानती हैः कोदों …
Read More »हाथी दादा – रामानुज त्रिपाठी
सूट पहन कर हाथी दादा चौराहे पर आए, रिक्शा एक इशारा कर के वे तुरंत रुकवाए। चला रही थी हाँफ–हाँफ कर रिक्शा एक गिलहरी बोले हाथी दादा मैडम ले चल मुझे कचहरी। तब तरेर कर आँखें वह हाथी दादा से बोली, लाज नहीं आती है तुमको करते हुए ठिठोली। अपना रिक्शा करूँ कबाड़ा तुमको यदि बैठा लूँ जान बूच कर …
Read More »गाय (भारत–भारती से) – मैथिली शरण गुप्त
है भूमि बन्ध्या हो रही, वृष–जाति दिन भर घट रही घी दूध दुर्लभ हो रहा, बल वीय्र्य की जड़ कट रही गो–वंश के उपकार की सब ओर आज पुकार है तो भी यहाँ उसका निरंतर हो रहा संहार है दाँतों तले तृण दाबकर हैं दीन गायें कह रहीं हम पशु तथा तुम हो मनुज, पर योग्य क्या तुमको यही? हमने …
Read More »अपराध – नसीम अख्तर
संकरी, अंधेरी गीली गीली गलियों के दड़बेनुमा घरों की दरारों से आज भी झांकते हैं डर भरी आंखों और सूखे होंठों वाले मुरझाए, पीले निर्भाव, निस्तेज चेहरे जिन का एक अलग संसार है और है एक पूरी पीढ़ी जो सदियों से भोग रही है उन कर्मों का दंड जो उन्होंने किए ही नहीं अनजाने ही हो जाता है उन से …
Read More »हौंसले – रेखा चंद्रा
खुले आसमान में करे परवाज हौसले हर पंछी में नहीं होते सिर्फ बहार ही तो नहीं बाग में ठूंठ भी यहां कम नहीं होते सीप में बने मोती हर बूंद के ऐसे मौके नहीं होते आंख में आंसू होंठों पर मुसकान ऐसे दीवाने भी कम नहीं होते जहां जाएं रोने के लिए ऐसे कोने हर घर में नहीं होते मरने …
Read More »उग आया है चाँँद – नरेंद्र शर्मा
सूरज डूब गया बल्ली भर – सागर के अथाह जल में। एक बाँँस भर उग आया है – चाँद‚ ताड़ के जंगल में। अगणित उँगली खोल‚ ताड़ के पत्र‚ चाँदनीं में डोले‚ ऐसा लगा‚ ताड़ का जंगल सोया रजत–पत्र खोले‚ कौन कहे‚ मन कहाँ–कहाँ हो आया‚ आज एक पल में। बनता मन का मुकुल इन्दु जो मौन गगन में ही …
Read More »तुम कितनी सुंदर लगती हो – धर्मवीर भारती
तुम कितनी सुंदर लगती हो जब तुम हो जाती हो उदास! ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खंडहर के आसपास मदभरी चांदनी जगती हो! मुख पर ढंक लेती हो आंचल ज्यों डूब रहे रवि पर बादल‚ या दिनभर उड़ कर थकी किरन‚ सो जाती हो पांखें समेट‚ आंचल में अलस उदासी बन! दो भूल–भटके सांध्य–विहग‚ पुतली में कर लेते निवास! …
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