राजा और नेत्रहीन संत

राजा और नेत्रहीन संत: आदमी की पहचान – प्राचीन शिक्षाप्रद हिंदी कहानी

राजाओं-महाराजाओं को शिकार पर जाने और शिकार करने की आदत तो होती ही है। कई बार शिकार पर जाते समय या शिकार करते समय ऐसी घटनाएं घटित हो जाती थीं जो कहानी बन जाती हैं और हमें उस घटना से बड़ी प्रेरणा मिल जाती है।

एक राजा एक बार अपनी शिकार करने वाली टीम को साथ लेकर शिकार खेलने गया। वहां शिकार ढूंढने और फिर शिकार का पीछा करने के चक्कर में सब एक-दूसरे से बिछुड़ गए।

राजा और नेत्रहीन संत: प्राचीन शिक्षाप्रद हिंदी कहानी

राजा अपने साथियों को ढूंढते-ढूंढते एक कुटिया के पास रुके। अंदर एक नेत्रहीन संत बैठे थे। राजा ने संत को प्रणाम कर अपने साथियों के बारे में पूछा तो वह बोले, “महाराज! पहले आपके सिपाही आए थे, उन्होंने आपके बारे पूछा और चले गए। फिर आपके मंत्री जी आए और अब आप पधारे हैं। इसी रास्ते से आप आगे जाएं तो मुलाकात हो जाएगी।”

नेत्रहीन संत के कहने पर राजा उसी रास्ते पर गया। राजा ने अपना घोड़ा तेज गति से दौड़ाया तो जल्द ही अपने सहयोगियों से जा मिला। नेत्रहीन संत के कहे अनुसार वे एक-दूसरे से आगे-पीछे ही पहुंचे थे।

यह बात राजा के दिमाग में घर कर गई कि उस नेत्रहीन संत को ‘यह कैसे पता चला कि मेरा पता पूछने वाले कौन हैं और उनका ओहदा क्या है?’

राजा के दिमाग में इस बात ने इतना जोर डाला कि उसने शिकार करने का विचार ही त्याग दिया। ‘राज हठ’ करते हुए राजा अपने सहयोगियों का लेकर सीधा उस नेत्रहीन संत की कुटिया पहुंचा और संत को प्रणाम करते हुए धन्यवाद किया और पूछा, “आपको दिखाई भी नहीं देता, फिर आपने कैसे जान लिया कि कौन सिपाही हैं, कौन मंत्री है और कौन राजा?”

राजा की बात सुनकर संत मुस्करा पड़े और बोले, “महाराज, आदमी की पहचान, उसकी वेशभूषा और हैसियत का ज्ञान नेत्रों से नहीं, उसकी बातचीत से और अच्छे व्यवहार से होता है। सबसे पहले आपके सिपाही मेरे पास आए और बोले ‘ऐ अंधे, इधर से जाते हुए किसी की आहट सुनाई दी क्या?’ मैं समझ गया कि वे संस्कार विहीन व्यक्ति छोटी पदवी वाले ही होंगे।”

“जब आपके मंत्री आए तब उन्होंने पूछा – ‘बाबा जी, क्या आप बताने की कृपा करेंगे कि किसी के जाने की आवाज तो नहीं सुनी?’ मैं समझ गया कि यह व्यक्ति कोई उच्च ओहदे वाला है क्योंकि बिना संस्कारों के कोई भी व्यक्ति किसी बड़े पद पर आसीन नहीं हो सकता इसलिए मैंने कहा कि सिपाहियों के पीछे मंत्री जी गए हैं।”

“जब आप स्वयं आए तो आपने जिस तरह से आदर सहित बात की, उससे मैं समझ गया कि आप राजा ही हो सकते हैं क्योंकि आपकी वाणी में आदर सूचक शब्दों का समावेश था। दूसरों का आदर वहीं करता है जिसे दूसरों से आदर करवाने की कला आती हो क्योंकि जिसे कभी कोई चीज मिली ही नहीं, वह उस वस्तु के गुणों को कैसे जान सकता है।”

“दूसरी बात, यह संसार वृक्ष स्वरूप है, जैसे वृक्ष में डालियां तो बहुत होती हैं पर जिस डाली पर ज्यादा फल लगते हैं, वही झुकती है। इसी अनुभव के आधार पर मैंने नेत्रहीन होते भी सिपाहियों, मंत्रियों और आपके पद का पता बताया। अगर कोई गलती हुई हो तो महाराज, मैं क्षमा की याचना करता हूं।”

राजा ने संत के अनुभव से प्रसन्न होकर उनकी जीवनवृत्ति का प्रबंध राजकोष से करने का मंत्री जी को आदेश दिया और सभी एक जानवर मारकर लाने की बजाय समाज में इज्जत मान दिलाने वाला ज्ञान लेकर आए।

शिक्षा: आजकल हमारा समाज संस्कार विहीन होता जा रहा है। थोड़ा-सा पद, पैसा व प्रतिष्ठा पाते ही दूसरे की उपेक्षा करते हैं जो उचित नहीं है। मधुर भाषा बोलने में किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान नहीं होता है। अतः मीठा बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए

~ उदय चंद्र लुदरा

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