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Poems For Kids

Poetry for children: Our large assortment of poems for children include evergreen classics as well as new poems on a variety of themes. You will find original juvenile poetry about trees, animals, parties, school, friendship and many more subjects. We have short poems, long poems, funny poems, inspirational poems, poems about environment, poems you can recite

सुबह सुबह से ही रोजाना – प्रभुदयाल श्रीवास्तव

सुबह सुबह से ही रोजाना - प्रभुदयाल श्रीवास्तव

हार्न‌ बजाकर बस का आना, सुबह सुबह से ही रोज़ाना। चौराहों पर सजे सजाये, सारे बच्चे आँख गड़ाये, नज़र सड़क पर टिकी हुई है, किसी तरह से बस आ जाये, जब आई तो मिला खज़ाना, सुबह सुबह से ही रोज़ाना। सुबह सुबह सूरज आ जाता, छत आँगन से चोंच लड़ाता, कहे पवन से नाचो गाओ, मंदिर में घंटा बजवाता, कभी …

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लेट लतीफ – समय पर काम ना ख़त्म करने वालों पर बाल-कविता

लेट लतीफ - समय पर काम ना ख़त्म करने वालों पर बाल-कविता

समय पर अपना काम निपटाओ, लेट लतीफ न तुम कहलाओ। काम कभी टालते न जाओ, छुटकारा इस आदत से पाओ। काम के प्रति उत्साह दिखाओ, लगनपूर्वक फिर उसमें जुट जाओ। काम भी पूजा कहलाता है, काम को ही अपना ध्येय बनाओ। काम में रूचि जो नहीं दिखाते, कामचोर हैं वह कहलाते। ~ ओम प्रकाश बजाज

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मोती जैसे दांत – शिक्षाप्रद हिंदी बाल-कविता

मोती जैसे दांत - शिक्षाप्रद हिंदी बाल-कविता

मोती जैसे दांत सबको भाते हैं, चेहरे को सुंदर आकर्षक बनाते हैं। चमकते-दमकते दांत हंसी और, मुस्कान में भी चार चांद लगाते हैं। मजबूत दांत अच्छा स्वास्थ्य दर्शाते हैं, स्वस्थ दांत बड़ी उम्र तक साथ निभाते हैं। दांतो और मसूढ़ों की अभी से, करो भली भांति देखभाल। मुख की साफ-सफाई का, हमेशा रखो पूरा-पूरा ख्याल। तकलीफ हो तो दंत चिकित्स्क …

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गिरिजा कुमार माथुर जी द्वारा शब्द-चित्रण – थकी दुपहरी

गिरिजा कुमार माथुर जी द्वारा शब्द-चित्रण - थकी दुपहरी

थकी दुपहरी में पीपल पर काग बोलता शून्य स्वरों में फूल आखिरी ये बसंत के गिरे ग्रीष्म के ऊष्म करों में धीवर का सूना स्वर उठता तपी रेत के दूर तटों पर हल्की गरम हवा रेतीली झुक चलती सूने पेड़ों पर अब अशोक के भी थाले में ढेर ढेर पत्ते उड़ते हैं ठिठका नभ डूबा है रज में धूल भरी …

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शुरू हुआ उजियाला होना – हरिवंश राय बच्चन

शुरू हुआ उजियारा होना - हरिवंश राय बच्चन

हटता जाता है नभ से तम संख्या तारों की होती कम उषा झांकती उठा क्षितिज से बादल की चादर का कोना शुरू हुआ उजियाला होना ओस कणों से निर्मल–निर्मल उज्ज्वल–उज्ज्वल, शीतल–शीतल शुरू किया प्र्रातः समीर ने तरु–पल्लव–तृण का मुँह धोना शुरू हुआ उजियाला होना किसी बसे द्र्रुम की डाली पर सद्यः जाग्र्रत चिड़ियों का स्वर किसी सुखी घर से सुन …

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सियारामशरण गुप्त हिन्दी कविता: मैं तो वही खिलौना लूँगा

सियारामशरण गुप्त हिन्दी कविता: मैं तो वही खिलौना लूँगा

‘मैं तो वही खिलौना लूँगा’ मचल गया दीना का लाल खेल रहा था जिसको लेकर राजकुमार उछाल–उछाल। व्यथित हो उठी माँ बेचारी – था सुवर्ण – निर्मित वह तो! ‘खेल इसी से लाल, – नहीं है राजा के घर भी यह तो!’ ‘राजा के घर! नहीं नहीं माँ तू मुझको बहकाती है, इस मिट्टी से खेलेगा क्यों राजपुत्र, तू ही …

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काम हमारे बड़े–बड़े: प्रेरणादायक बाल-कविता

काम हमारे बड़े–बड़े: प्रेरणादायक बाल-कविता

हम बच्चे हैं छोटे–छोटे, काम हमारे बड़े–बड़े। आसमान का चाँद हमी ने थाली बीच उतारा है, आसमान का सतरंगा वह बाँका धनुष हमारा है। आसमान के तारों में वे तीर हमारे गड़े–गड़े। हम बच्चे हैं छोटे–छोटे, काम हमारे बड़े–बड़े। भरत रूप में हमने ही तो दांत गिने थे शेरों के, और राम बन दांत किये थे खट्‌टे असुर–लुटेरों के। कृष्ण–कन्हैया …

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बंदर जी – भूखे बंदर पर हिंदी बाल-कविता

बंदर जी - भूखे बन्दर पर हिंदी बाल-कविता

देख कूदते बंदर जी को इस डाली से उस डाली, हंसते शोर मचाकर बच्चे पीटे ताली पे ताली। लगता है बंदर मामा जी आज बड़े ही भूखे हैं, उतरा-उतरा सा चेहरा है होंठ भी इनके सूखे हैं। तभी एक बच्चे को देखा मामा ने केला खाते, दौड़े उसके पास पहुंच गए फिर मुस्कराते-मुस्कराते। बच्चे ने फिर उनको जी भर केला …

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अच्छे बच्चे – शिक्षाप्रद हिंदी बाल कविता

अच्छे बच्चे - शिक्षाप्रद हिंदी बाल कविता

कहना हमेशा बड़ो का मानते माता पिता को शीश नवाते, अपने गुरुजनों का मान बढ़ाते वे ही बच्चे अच्छे कहलाते। नहा-धोकर रोज शाला जाते पढ़ाई में सदा अव्वल आते वे ही बच्चे अच्छे कहलाते। कभी न किसी से झगड़ा करते बात हमेशा सच्ची कहते, ऊंच-नीच का भाव न लाते वे ही बच्चे अच्छे कहलाते। कठिनाइयों से कभी न घबराते हमेशा …

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हुआ पसीने से तर: तपती गर्मी पर हिंदी बाल-कविता

हुआ पसीने से तर: तपती गर्मी पर हिंदी बाल-कविता

गर्मी में खाने को मैंने फ्रिज से सेब निकाला, गिरते-गिरते बचा हाथ से झट से उसे संभाला। बाहर आते ही गर्मी से हुआ बहुत बेहाल, बोला भइया नहीं उतारो मेरी नाजुक खाल। घबराहट में सिसक पड़ा वह लगा कांपने थर-थर, आंसू भर रोया बेचारा हुआ पसीने से तर। ~ रावेंद्र कुमार रवि

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