महिला दिवस के उपलक्ष में एक कहानी: पुनर्जन्म

पुनर्जन्म: महिला दिवस के उपलक्ष में एक कहानी

अचानक ऐसा लगता हैं जैसे सब खत्म हो गया और दूसरे ही पल फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया। क्या समुद्र के किनारे आराम से बैठकर मिट्टी के बड़े-बड़े महल बनाते बच्चों ने सोचा होगा कि केवल एक लहर, सिर्फ एक लहर ही काफ़ी हैं, अथक परिश्रम से बनाये गए उनके आलीशान महल को अपने साथ ले जाने के लिए, जिनमें कहाँ खिड़की होगी या कहाँ दरवाजा, इस बात पर हल्की फुल्की बहस से बात बढ़कर एक दूसरे के बाल नोचने तक की नौबत आ जाती है। घर में आया से लेकर माँ तक की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए मेरा जन्मदिन केवल कैलेंडर के अंदर ही मोमबत्तियां जलाता और बुझाता रहा और मैं बाहर रसोई में सब्जी का छोंका लगाते हुए अधमरी हुई जाती रही।

पुनर्जन्म: मंजरी शुक्ला [Page I]

क्या हो जाता हैं उस समय, सभी लड़कियों को शादी से पहले, जब वो अपने घर अपने ससुराल और ख़ास तौर से जब अपने विवाह का दिन याद करती हैं। मुझे याद हैं, मैं शादी के एक दिन पहले खुद को आईने के सामने देखने में भी कितना सकुचा रही थी। कितना प्यार, कितना स्नेह भरा होता हैं एक लड़की के मन में, शादी के विचार को लेकर, पर शादी के बाद ही वो सफ़ेद काँच का टुकड़ा जैसे अपने सारे रंग खो देता हैं और इतना भद्दा और धुंधला सा हो जाता हैं कि जैसे कोई किरण उसके आर पार जा ही नहीं सकती। बस, मेरे साथ भी कुछ ऐसा हुआ सास-ससुर और पति के तटस्थ व्यवहार ने जैसे मुझे पत्थर का बना दिया मेरे अंदर के प्रेम के झरने को बहने से पहले ही इन सब लोगो ने मिलकर ऐसे सुखा दिया जैसे कोई कोंपल फूटने से पहले निष्ठुर माली ही उस पेड़ को काट कर फेंक दे। ऐसा नहीं था कि कोई मुझसे प्यार नहीं करता था या किसी को मेरी परवाह नहीं थी, पर परवाह तो हस्पताल में लेटे हुए मरीज की एक नर्स भी करती हैं, वकील अपने अमीर क्लाइन्ट की भी करता हैं क्योंकि इसमें दो तरफ़ा स्वार्थ छिपा हुआ होता हैं। पर शायद मेरे मन के कोने में अभी भी उस बचपन के दोस्त की छवि अंकित हैं जो बचपन के दिनों में मुझे अपनी बड़ी बड़ी आखों से चुपचाप देखा करता था। उस मौन में एक मूक आमंत्रण छिपा हुआ था जिसे मैं कभी चाहकर भी स्वीकार ना कर सकी।

पता ही नहीं चलता और समझ में भी नहीं आता कि आखिर इतने सालों तक मैं जिन रिश्तों का ताना बाना एक मकड़ी के जाले के सामान बुनती रही पर खुद ही उसमें उलझती चली गई और उसमें किसी गैर को बाँध के रखने के बजाय खुद ही फँस गई। समझ में ही नहीं आया कि आखिर इस चक्रवियुह से बाहर निकलू तो आखिर कैसे निकलू।

दूर से देखने में तो ऐसा लगता था जैसी चाँदी के चमकीले महीन धागे हो और बहुत ही खूबसूरती से एक दूसरे के साथ चमचमाती हुई चाँदनी को सुई में पिरोकर फैला दिया गए हो पर अंदर से देखने पर वो एक ऐसा जाल था जो इतनी मजबूती से बनाया गया था जिसमें रहकर सिर्फ छटपटाना था और उससे बाहर निकलने का सोचा भी नहीं जा सकता था अकेले में बैठकर मैं खुद ही आँसूं बहाती और खुद ही पोंछती क्योंकि जानती थी कि किसी के आगे रोने से भी कुछ नहीं होने वाला। सारे शौक, सारे गहने और महँगी साड़ियाँ, ससुराल आने पर अलमारी में से एक के बाद एक जैसे बाहर आई थी वैसे ही दबे पाँव अपने आप अपनी जगह बनाती हुई अलमारी के अंदर इत्मीनान से जाकर बैठ गई और मैं जान ही नहीं पाई। बच्चे हुए तो मन में एक उम्मीद जगी कि वो मेरे दुखते हुए फोड़ों पर मरहम लगाने का काम करेंगे, पर जब तक उन्हें मेरी जरुरत थी वो मेरे साथ साये की तरह रहे पर जैसे ही उन्हें दुनियादारी का भान हुआ तो वो भी धीरे से कट लिए मुझसे।

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