खिलौनों वाला अध्यापक: बच्चों में पढ़ने-लिखने की रुचि जगाने का अनूठा तरीका

खिलौनों वाला अध्यापक: बच्चों में पढ़ने-लिखने की रुचि जगाने का अनूठा तरीका

खिलौनों वाला अध्यापक: कुंदनलाल खिलौने बेचने का व्यापार करता था। वह गांव-गांव घूम कर खिलौने बेचता था। उसके पास बेचने के लिए छोटी-बड़ी गेंदें, जादू के डिब्बे, टोपियां, बांसुरियां, गुब्बारे, जहाज, ट्रैक्टर तथा अन्य खिलौने होते थे।

उसके एक बड़े से झोले में टॉफियां तथा थोड़ी-बहुत खाने की चीजें भी होती थीं लेकिन वे खाने-पीने की चीजें बेचने के लिए नहीं होती थीं। उसका स्वभाव बहुत अच्छा था।

खिलौनों वाला अध्यापक: प्रिंसीपल विजय कुमार

वह बच्चों से इतना घुला-मिला हुआ था कि हर गांव में बच्चे उसके दोस्त बन गए थे। बच्चे उसके आने की प्रतीक्षा करते रहते। जिस दिन वह आता, उस दिन गली-मोहल्ले में बच्चों की भीड़ इकट्ठी हो जाती।

बच्चों को खिलौने बेचने के बाद वह बच्चों से पानी मंगवा कर पहले खाना खाता फिर अपने खिलौने बेचने वाली साइकिल एक तरफ खड़ी करके अपनी खाने-पीने वाली चीजों का बड़ा-सा झोला लेकर बैठ जाता।

वह बच्चों से पूछता, “बच्चों, मैंने तुझे कौन से विषय के सवाल याद करके आने के लिए कहा था?”

वह कभी बच्चों से गणित के पहाड़े पूछता, कभी उनसे जुबानी छोटे-छोटे सवाल पूछता, कभी भाषाओं के बारे में प्रश्न पूछता, कभी सामान्य ज्ञान के और कभी विज्ञान और इतिहास के प्रश्न पूछता था।

जो बच्चा उसके प्रश्न के उत्तर ठीक दे देता, उसे वह टॉफियां या फिर कोई न कोई खाने की चीज देता और उस बच्चे के लिए तालियां बजवाता।

बच्चे तालियां बजाकर खुश होते। जो बच्चा उसके सभी प्रश्नों के सही उत्तर दे देता, उसे वह कोई न कोई खिलौना भी देता। जो उसके प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाता, उसे वह मेहनत करने के लिए कहता।

उस द्वारा बच्चों से सवाल पूछना, बच्चों द्वारा उसके प्रश्नों के उत्तर देकर उससे खाने-पीने की चीजें लेना, बच्चों के लिए मनोरंजन और खेल का साधन बन गया था। बच्चे उसके साथ बहुत मित्रवत हो गए थे।

बच्चे मन में अक्सर सोचते कि वह उनसे प्रश्न पूछकर उन्हें खाने-पीने की चीजें क्यों देता है?

बच्चे मौका देखकर उससे अपने इस प्रश्न का उत्तर पाना चाहते थे। ‘खिलौने वाले अध्यापक‘ के इस खेल ने बच्चों को धीरे-धीरे पढ़ने की आदत डाल दी थी।

बच्चे भी उसके बताए हुए सभी विषयों के प्रश्न याद करने से लेकर पहाड़े सीखने लग पड़े थे। बच्चों के माता-पिता तथा अध्यापक भी हैरान और खुश थे कि उनके बच्चों में पढ़ने की इतनी रुचि कैसे पैदा हो गई है।

एक दिन बच्चों ने उससे पूछ ही लिया, “अंकल, आप हमसे प्रश्न पूछकर हमें ये खाने-पीने वाली चीजें क्यों देते हो?”

उसने बच्चों के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, “बच्चों, समय आने पर मैं एक दिन आपके इस प्रश्न का उत्तर अवश्य दूंगा।”

कुछ महीनों के बाद उस खिलौनों वाले अध्यापक ने गांव के सारे बच्चों से कहा, “बच्चों, आज आपके गांव में मेरा अंतिम दिन होगा। कल से मैं किसी अन्य गांव में जाना शुरू करूंगा। आप जानना चाहते थे कि मैं आपको प्रश्न पूछकर खाने-पीने की चीजें क्यों देता हूं?”

“आज मैं आपको इसका कारण बताऊंगा। बच्चों, मेरे पिता जी भी गांव-गांव घूमकर खिलौने बेचने का काम करते थे। मैं पढ़ने में होशियार था। हमारा परिवार बड़ा था। एक दिन बीमारी के कारण पिता जी की मृत्यु हो गई। मुझे परिवार का गुजारा चलाने के लिए पढ़ाई छोड़नी पड़ी, जिसका मुझे आज भी दुख है। मैंने बच्चों की पढ़ाई को अपना लक्ष्य बना लिया है। मैं चाहता हूं कि कोई भी बच्चा पढ़ने से वंचित न रह जाए। मैं बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा करना चाहता हूं।”

बच्चे अपने प्रश्न का उत्तर सुनकर खुश और हैरान भी हुए। उन्होंने पूछा, “तो अंकल, अब आप हमारा गांव छोड़कर क्यों जा रहे हो?”

उसने उत्तर दिया, “बच्चों, अब मुझे किसी और गांव के बच्चों के मन में पढ़ने की दिलचस्पी पैदा करनी है।”

~ ‘खिलौनों वाला अध्यापक‘ Hindi story by ‘प्रिंसीपल विजय कुमार‘

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