होनहार बच्चे: माता-पिता की सेवा करने से मिलता है देवताओं का आशीर्वाद

होनहार बच्चे: माता-पिता की सेवा करने से मिलता है देवताओं का आशीर्वाद

दार्जिलिंग के पास एक कस्बा था। उस कस्बे में बहादुर नाम का एक फल विक्रेता रहता था।

उसके दो बच्चे थे। बेटा संगमा बड़ा था और बेटी देविका उससे छोटी थी।

बहादुर रोज सुबह उठकर फल मंडी जाता और इसके बाद ठेले पर फल रखकर गली-मोहल्लों में बेचता।

संगमा और देविका रोज अपने स्कूल पढ़ने जाते और छुट्टी होने पर कभी-कभी अपने पिता के साथ फल बेचने के लिए आ जाते।

एक दिन रोज की तरह बहादुर फल मंडी से आ रहा था। अचानक उसका एक्सीडेंट हो गया। उस एक्सीडेंट में उसके एक पांव में फैक्चर हो गया।

होनहार बच्चे: प्रेरणादायक हिंदी कहानी

“देखो बहादुर, अभी तुम्हें दो महीने आराम करना पड़ेगा” डाक्टर ने सलाह देते हुए कहा।

“डॉक्टर साहब मैं तो रोज कमाता और खाता हूं। दो महीने फल नहीं बेचूंगा तो…” बहादुर ने रुआंसा होकर कहा।

डाक्टर जी बोले, “बहादुर भाई… तुम्हारा नाम बहादुर है और बोल ऐसे रहे हो, जैसे कोई डरपोक आदमी”।

फिर डाक्टर जी एक पल रुक कर बोले, “देखो, मजदूरी तो जिंदगी भर करनी है और अभी लापरवाही कर दी तो पैर ठीक नहीं होगा… एक दिव्यांग बनकर जीने से तो अच्छा है, कुछ दिन आराम करो”।

“डाक्टर साहब ठीक कह रहे हैं संगमा के पापा। आपको आराम ही करना चाहिए” संगमा की मम्मी ने कहा।

“फिर घर का खर्च कैसे चलेगा?” बहादुर ने चिंतित स्वर में पूछा।

इस पर संगमा की मम्मी बोलीं, “फल मैं बेचूंगी और मेरी मदद करेंगे अपने दोनों बच्चे”।

“हां पापा, मम्मी ठीक कह रही हैं” संगमा बोला।

कुछ दिनों से संगमा और देविका स्कूल नहीं जा रहे थे।

“अरे बच्चों तुम में से कोई संगमा का घर जानता है… और जानता हो तो पता लगाओ कि वह स्कूल क्यों नहीं आ रहा” टीचर ने पूछा।

“सर मैं जानता हूं संगमा का घर। दरअसल वह बाजार में फल बेच रहा है” एक लड़के ने कहा।

“फल बेच रहा है…? क्यों भई?” टीचर ने पूछा।

लड़के ने उसके पिताजी के एक्सीडेंट के बारे में बता दिया।

टीचर को यह सुनकर बड़ा दुख हुआ। होनहार संगमा बचपन में ही काम-काज में लग गया।

स्कूल की छुट्टी होने पर टीचर बाजार में गए। ढूंढते हुए वे वहां पहुंच गए जहां संगमा अपनी छोटी बहन देविका के साथ फल बेच रहा था।

“अरे संगमा… और देविका तुम दोनों फल बेच रहे हो?” टीचर ने पूछा।

“जी सर, बात ऐसी है कि…” संगमा कुछ बोलता, उससे पहले टीचर ने कहा, “बस-बस कुछ बताने की जरूरत नहीं है… मुझे सब पता है।”

संगमा और देविका चुपचाप अपने ठेले से उतर गए।

“बेटा संगमा चिंता मत करो… तुम दोनों सचमुच बहादुर पिता के बहादुर बच्चे हो… इतनी सी उम्र में पिता के काम को संभाल लिया। दो महीने बाद तुम स्कूल आ जाना। हां ध्यान रहे… फल बेचने के साथ-साथ पढ़ाई पर भी ध्यान रहे” टीचर ने कहा।

“सर हमें पढ़ाएगा कौन?” देविका ने पूछा।

“मैं पढ़ाऊंगा बेटी… तुम दोनों को रोजाना एक घंटा शाम सात बजे से आठ बजे तक…। तब तक तो घर आ जाया करोगे?” टीचर ने कहा।

“जी सर… मगर आपकी फीस…?” संगमा कहता-कहता ठिठक गया।

“फीस? फीस तो तुम से लूंगा मैं” टीचर ने मुस्कुराते हुए कहा।

“सर आप तो हमारे घर और पिताजी की हालत के बारे में जानते हो” देविका बोली।

“अरी नन्ही परी देविका तेरे हाथ की बनी एक कप चाय जरूर पिया करूंगा… यही मेरी फीस होगी।” टीचर ने देविका का नाक खींचते हुए कहा।

यह सुनकर दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े। फिर दोनों ने अपने टीचर को धन्यवाद देते हुए उनके पैर छुए।

~ गोविन्द भारद्वाज, अजमेर, राजस्थान

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