दोस्ती के रंगों वाली होली: प्रेरणादायक हिंदी कहानी

दोस्ती के रंगों वाली होली: प्रेरणादायक हिंदी कहानी

“मैं होली पर बड़ी वाली लाल पिचकारी खरीदूंगा” अम्बर ने माही से कहा।

“मैं तो पीले रंग वाली खरीदूंगी जो तेरी लाल से भी बड़ी होगी” माही ने कहा।

“और मेरे से बड़ी पिचकारी तो किसी की हो ही नहीं सकती, जैसा कि तुम सभी जानते हो” सचिन ने मुस्कुराते हुए कहा।

“मैं लाल और पीला गुलाल खरीदूंगा। ये दोनों ही रंग मुझे बहुत पसंद हैं” सोनू ने कहा।

“मैं तो हरा, नारंगी, हरा, पीला, गुलाबी, नीला… और भी वे बहुत सारे रंग मुझे याद नहीं आ रहे हैं सब खरीदूंगा” सचिन एक ही साँस में बोला।

“इसकी डींगे मारने की आदत कभी नहीं जायेगी” अम्बर ने धीरे से माही से कहा पर सचिन ने सुन लिया।

“मैंने कभी कोई डींगे नहीं मारी। तुम सब जानते हो कि तुम सबसे मेरा सामान हमेशा अच्छा होता है”।

“अच्छा, अब झगड़ो मत” माही ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा।

“होली पर मेरे मामा मुझे क्रिकेट बैट दिलवा रहे हैं” सोनू ने खुश होते हुए कहा।

“मेरे पास पाँच क्रिकेट बैट हैं” सचिन तुरंत बोला।

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“तुम्हारे पास सब कुछ है तो उन्हें अकेले बैठकर खेलो। हमें मत बताओ” माही ने नाराज़ होते हुए कहा।

“अरे वाह, क्यों ना बताऊँ। तुम लोग बताते हो तो मैं भी तो सुनता हूँ” सचिन ने पालथी मारते हुए कहा।

अम्बर ने कहा – “ये सब बातें छोड़ो। मेरे घर होली पर सब गुझिया खाने आना। मेरी मम्मी बहुत स्वादिष्ट गुझिया बनाती हैं”।

“और मेरे यहाँ दहीबड़े खाने आना” सोनू ने खुश होते हुए कहा।

“और मेरे यहाँ गुझिया, दहीबड़े के साथ साथ समोसे और छोले भठूरे भी बनेंगे”।

“रहने दे, होली के दिन वैसे भी घर में इतना काम होता है कि इतनी सारी चीज़े कोई भी नहीं बना सकता” अम्बर ने कहा।

“तुम लोग मुझसे किसी भी बात में जीत नहीं सकते” कहते हुए सचिन जोरों से हँसा।

माही का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और वह बोली – “हमेशा दोस्तों का मजाक उड़ाना अच्छी बात नहीं होती है”।

“मैं फ़िर कह रहा हूँ कि होली के दिन इतना सामान कौन बनाएगा। आंटी होली खेलेंगी या दिन भर चौके में रहेंगी” सोनू ने कहा।

“शर्त लगा लो” हमेशा की तरह सचिन बोल पड़ा।

“ठीक है। जो भी शर्त हारेगा उसे एक महीने तक रोज़ दूसरे के बगीचे में काम करना पड़ेगा” अम्बर ने कहा।

“हा हा, तो फ़िर मेरे बड़े से बगीचे में काम करने के लिए तैयार हो जाओ” सचिन ने कहा और हँसते हुए वहाँ से चला गया।

“उनके घर में तो खाना बनाने वाली आंटी भी आती हैं, हो सकता है वह सारा खाना बना दे” माही ने कहा।

“वह बहुत दूर रहती हैं और होली के दिन वह नहीं आएँगी” अम्बर हँसते हुए बोला।

उधर सचिन जब गुनगुनाता हुआ जब घर पहुँचा तो सीधा खाना बनाने वाली आंटी के पास पहुँचा और बोला – “आपने गुझिया और दही बड़े बना दिए हैं क्या”?

“और क्या! दहीबड़े तो फ्रिज में रख भी दिए। कल होली में ठंडे ठंडे दहीबड़े मीठी चटनी के साथ खाना तो बड़ा मज़ा आएगा”।

“और कल आप आकर गर्म गर्म समोसे और छोले भठूरे बना देना” सचिन बोला।

“मेरा घर तो पूरे चार किलोमीटर दूर है इसलिए होली पर मैं खाना बनाने कहीं नहीं जाती क्योंकि लौटते में चारों तरफ़ रंग खेला जाता है”।

मम्मी मुस्कुराते हुए बोली – “समोसे या छोले भठूरे में से एक चीज़ में बना दूंगी क्योंकि शाम को पापा के दोस्त भी आएँगे तो उनके चाय नाश्ते का भी इंतज़ाम करना है”।

मम्मी की बात सुनते ही सचिन के होश उड़ गए। इसका मतलब वह शर्त हार जाएगा।

वह जैसे रोने को हुआ और अपने आँसूं रोकते हुए अपने कमरे में चला गया।

रात भर वह ठीक से सो भी नहीं सका।

उसने मम्मी से कहा – “मेरे दोस्त आएँ तो आप उन्हें मना कर देना कि मैं घर पर नहीं हूँ”।

“मैं झूठ नहीं बोलूंगी” कहते हुए मम्मी वापस सफ़ाई करने लगी।

थोड़ी देर बाद ही दरवाज़े की घंटी बजी।

सचिन ने डरते हुए दरवाज़ा खोला तो सामने अम्बर, माही और सोनू खड़े हुए थे।

“वो… वो…” कहते हुए सचिन ने सर झुका लिया।

“क्या?” माही ने सचिन के उदास चेहरे को देखकर पूछा।

“समोसे और दहीबड़े नहीं हैं” सचिन ने सिर नीचा किये हुए जवाब दिया।

“किसने कहा कि नहीं हैं” अम्बर ने हँसते हुए कहा।

और माही और अम्बर ने मुस्कुराते बैग से टिफ़िन निकाल कर मेज पर रख दिए, जिन्हें खोलते ही समोसे और छोले भठूरों की ख़ुश्बू से घर महक उठा।

सचिन के गालों पर ओस की बूंदों से मोती झिलमिला उठे जिन में दोस्ती के पक्के रंग जगमगा रहे थे।

~ ‘दोस्ती के रंगों वाली होली’ by डॉ. मंजरी शुक्ला

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