दिवाली की सच्च्ची रोशनी: प्रेरक लघुकथा

दिवाली की सच्ची रोशनी: प्रेरक लघुकथा

दिवाली की सच्ची रोशनी: पुराने समय कौ बात है। महीप नगर में रतनचंद और माणिकदत्त नामक दो व्यापारी रहते थे। दोनों ही नगर के सबसे अमीर व्यक्ति थे। वहां के राजा महीपाल बड़े ही न्यायप्रिय एवं प्रजा बत्सल थे। राजा को तरह-तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित करने का विशेष शौक था।

एक बार दिवाली के समय उन्होंने घोषणा करवाई कि दिवाली के दिन पूरे नगरवासी अपने घरों में ज्यादा से ज्यादा रोशनी करें। जिसके घर में सबसे ज्यादा रोशनी होगी।
उसे एक गांव की जागीर मिलेगी।

दिवाली की सच्ची रोशनी: नीता वर्मा

अब क्या था, रतनचंद और माणिकदत्त ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दीं।

उस जमाने में दिवाली पर रोशनी करने का साधन सिर्फ मिट्टी के दीए ही थे। दोनों ने ढेर सारे दीए खरीद लिए।

दिवाली के दिन सुबह से हो दोनों के नौकर दीयों को धोकर, सुखा कर उनमें तेल-बाती भरने का काम करने लगे। देखते- देखते संध्या होने को आई। अब दीए जलाने का काम शुरू होने ही वाला था कि कहाँ से पांच बालक वहां आए। पहले वे रतनचंद के दरवाजे पर पहुंचे।

उसने उन्हें देख कर पूछा, “क्या बात है, तुम लोगों को क्‍या चाहिए?”

उनमें से एक बालक ने हाथ जोड़कर कहा, “हमारे माता-पिता अत्यंत निर्धन हैं। आज दिवाली के दिन भी हमारे घरों में रोशनी करने के लिए न तो दीए हैं, न ही तेल और बाती।”

रतनचंद बोला, “तो मैं क्या करूं?”

दूसरे बालक ने विनम्रता से कहा, “हम लोग आपका नाम सुनकर यहां आए हैं। भगवान ने आपको बहुत दिया है। अगर आप हमें दस-दस दिए तेल और बाती के साथ दे देंगे तो हमारे घरों में भी थोड़ी रोशनी हो जाएगी।”

रतनचंद को गुस्सा आ गया। उसने उन्हें डांटकर कहा, “मैंने तुम लोगों के घरों में रोशनी करने का ठेका ले रखा है क्या, चलो भागो यहां से।”

पांचों बालक वहां से निकल कर माणिकदत्त के दरवाजे पर पहुंचे। उन्हें अपनी समस्या बताई।

माणिकदत्त ने कुछ पल सोच कर अपने दीयों को 6 बराबर बागों में बांट दिया। फिर एक-एक भाग दीया, तेल और बाती के साथ टोकरी में रखवा कर उन बालकों को दे दिया। यही नहीं, कुछ अनाज वगैरह भी उसने टोकरी में रखवा दिया। बालकों को प्रेम से विदा करके वह बचे हुए दीयों को जलाकर अपने घर में रखने लगा।

कुछ देर बाद राजा की सवारी निकली। नगर की रोशनी देखते-देखते वह रतनचंद के घर के सामने रुक गए।

उसके घर की सजावट और रोशनी सचमुच बेमिसाल थी। रतनचंद ने गर्व से अकड़ कर राजा को प्रणाम किया। इसके बाद राजा की नजर माणिकदत्त के घर पर पड़ी ।

उन्होंने उसे बुलाकर पूछा, “माणिकदत्त क्या आपने हमारी घोषणा नहीं सुनी थी?”

माणिकदत्त ने राजा से बालकों वाली बात बताकर विनम्रता से कहा, ”मैंने आपकी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए आप जो चाहे मुझे दंड दे सकते हैं, लेकिन दूसरों के घर का अंधकार दूर करना मेरी नजर में कोई अपराध नहीं है। मुझे अपने किए पर संतोष है।”

राजा ने गदगद स्वर में कहा, “अब मैं आपको एक नहीं दो गांवों कौ जागीर सौंपता हूं। उन बालकों को मैंने ही भेजा था, यह देखने के लिए कि आप लोग रोशनी का मतलब समझते हैं या नहीं।”

राजा कौ बात सुनकर रतनचंद सकपका गया। उसने धीरे से कहा, “महाराज हम कुछ समझे नहीं।”

राजा बोले, “अपने घर में तो सभी लोग उजाला करते हैं। सच्ची रोशनी तो वही करता है जो दूसरों के घर का अंधकार दूर कर दे। माणिकदत्त ने यही काम किया है, इसलिए वह इनाम के हकदार हैं।”

यह सुन कर रतनचंद अपना-सा मुंह लेकर रह गया।

~ “नीता वर्मा” की प्रेरक लघुकथा “दिवाली की सच्ची रोशनी”

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