बचपन - वंश - Short Hindi Poetry about Childhood

बचपन: Short Hindi Poetry about Childhood

बचपन जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण समय होता है। इसमें इतनी चंचलता और मिठास भरी होती है कि हर कोई फिर से इसे जीना चाहता है। बचपन में वह धीरे-धीरे चलना, गिर पड़ना और फिर से उठकर दौड़ लगाना बहुत याद आता है।

पिताजी के कंधे पर बैठकर मेला देखने का जो मजा होता था वह अब नहीं आता है। मिट्टी में खेलना और मिट्टी से छोटे-छोटे खिलौने बनाना किसकी यादों में नहीं बसा है।

जब कोई डांटता था तो मां के आंचल में जाकर छुप जाते थे। मां की लोरियां सुनकर नींद आ जाती थी लेकिन अब वह सुकून भरी नींद नसीब नहीं होती है। वो सुनहरे दिन जब हम खेलते रहते थे तो पता ही नहीं चलता कब दिन होता और कब रात हो जाती थी।

किसी के बाग में जाकर फल और बैर तोड़ जाते थे तब वहां का माली पीछे भागता था वह दिन किसको याद नहीं आते। शायद इसीलिए बचपन जीवन का सबसे अनमोल पल है।

बचपन: Short Hindi Poetry about Childhood

छीनकर खिलौनों को बाँट दिए ग़म,
बचपन से दूर, बहुत दूर हुए हम।
अच्छी तरह से अभी पढ़ना न आया,
कपड़ो को अपने बदलना न आया।

लाद दिये बस्ते भारी-भरकम,
बचपन से दूर-दूर हुए हम।
अंग्रेजी शब्दों को पढ़ना-पढ़ाना,
घर आके दिया हुआ, काम निबटाना।

होमवर्क करने से फूल जाए दम,
बचपन से बहुत-बहुत दूर हुए हम।
देकर के थपकी, न माँ मुझे सुलाती,
दादी है अब नहीं, कहानियाँ सुनती।

बिलख रही कैद बनी, जीवन सरगम।
बचपन से बहुत दूर-दूर हुए हम।

~ वंश (एल.के.जी.) St. Gregorios School, Sector 11, Dwarka, New Delhi – 110075

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