सर्दी: ओमप्रकाश बजाज
गर्मी से मिला छुटकारा।
सुहाने लगी सुबह की धुप,
अच्छा लगता गर्म सूप।
किटकिटाते हैं दांत,
और ठिठुरते हैं हाथ।
चलती है ठंडी-ठंडी हवा,
मुंह से निकलता है धुआं।
सर्दी से सब का हाल बेहाल,
फट रहे बच्चों के गाल।
रजाई छोड़ने का मन नहीं होता,
मुंह धोने का भी साहस नहीं होता।
गर्म कपड़ो से सब लदे हुए हैं,
दुबले भी तगड़े बने हैं।
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