अनोखा घर – प्रतिक दुबे

सबका अपना होता है,
सबको रहना होता है,
और जहाँ सुख-दुःख होता है,
वह अनोखा घर होता है।

चार-दीवार के अंदर रहते सब,
समय पता नही बीत जाता है कब,
वह अनोखा घर होता है।

जहाँ सब अपना काम करते है,
मिल-जुलकर साथ हमेशा रहते है,
वह अनोखा घर होता है।

आज मनुष्य की हरकतों से घर बिखरता जा रहा है,
एकता का वातावरण पिघलता जा रहा है,
कहीं ऐसा ना हो कि कोई कहे पहले ऐसा होता था,
हर अच्छा घर, अनोखा घर होता था।

∼ प्रतिक दुबे

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