Poems In Hindi

बच्चों की हिन्दी कविताएं — 4to40 का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children. पढ़िए कुछ मजेदार, चुलबुली, नन्ही और बड़ी हिंदी कविताएँ. इस संग्रह में आप को बच्चो और बड़ो के लिए ढेर सारी कविताएँ मिलेंगी.

सूरज भाई – इंदिरा गौड़

सूरज भाई - इंदिरा गौड़

क्या कहने हैं सूरज भाई अच्छी खूब दुकान सजाई और दिनों की तरह आज भी जमा दिया है खूब अखाड़ा पहले किरणों की झाड़ू से घना अँधेरा तुमने झाड़ा फिर कोहरे को पोंछ उषा की लाल लाल चादर फैलाई। ज्यों ही तुमको आते देखा डर कर दूर अँधेरा भागा दिन भर की आपा धापी से थक कर जो सोया था …

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दीदी का भालू – राजीव कृष्ण सक्सेना

दीदी का भालू - राजीव कृष्ण सक्सेना

दीदी के कमरे में, दीदी संग रहते थे दीदी का कुत्ता भी, बंदर भी, भालू भी छोटी सी थी बिटिया, जब वे घर आए थे नन्हीं दीदी पा कर, बेहद इतराए थे वैसे तो रूई से भरे वे खिलौने थे दीदी की नजरों में प्यारे से छौने थे सुबह सुबह दीदी जब जाती बस्ता लेकर ऊंघते हुए तीनो अलसाते बिस्तर …

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अध्यापक की शादी – जैमिनि हरियाणवी

अध्यापक की शादी - जैमिनि हरियाणवी

एक अध्यापक की हुई शादी सुहागरात को दुल्हान का घूँघट उठाते ही अपनी आदत के अनुसार उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी – “तेरा नाम चंपा है या चमेली? कौन कौन सी थी तेरी सहेली?” सहेलियों की और अपनी सही–सही उम्र बता! तन्नैं मैनर्स आवैं सै कि नहीं – पलंग पर सीधी खड़ी हो जा! तेरे कितने भाई बहन हैं? कितने …

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बड़ी बात है – राजा चौरसिया

बड़ी बात है - राजा चौरसिया

हंसमुख रहना बड़ी बात है असफलता पर रोना–धोना केवल समय कीमती खोना काँटों में भी खिलने वाले फूलों जैसे हमको होना संकट सहना बड़ी बात है। जो उमंग में कमी न रखता उसका चेहरा आप चमकता बड़ों–बड़ों का भी है कहना धन से बढ़कर है प्रसन्नता हंसकर कहना बड़ी बात है। सदा–बहार वही कहलाए जो स्वभाव से हँसे हँसाए जिसके …

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लहर सागर का नहीं श्रृंगार – हरिवंशराय बच्चन

लहर सागर का नहीं श्रृंगार - हरिवंशराय बच्चन

लहर सागर का नहीं श्रृंगार, उसकी विकलता है; अनिल अम्बर का नहीं, खिलवार उसकी विकलता है; विविध रूपों में हुआ साकार, रंगो में सुरंजित, मृत्तिका का यह नहीं संसार, उसकी विकलता है। गन्ध कलिका का नहीं उद्गार, उसकी विकलता है; फूल मधुवन का नहीं गलहार, उसकी विकलता है; कोकिला का कौन-सा व्यवहार, ऋतुपति को न भाया? कूक कोयल की नहीं …

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आँगन – धर्मवीर भारती

आँगन - धर्मवीर भारती

बरसों के बाद उसी सूने- आँगन में जाकर चुपचाप खड़े होना रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना मन का कोना-कोना कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना फिर आकर बाँहों में खो जाना अकस्मात् मण्डप के गीतों की लहरी फिर गहरा सन्नाटा हो जाना दो गाढ़ी मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना, कँपना, बेबस हो गिर जाना रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना मन …

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भोर हुई – रूप नारायण त्रिपाठी

भोर हुई - रूप नारायण त्रिपाठी

भोर हुई पेड़ों की बीन बोलने लगी, पत पात हिले शाख शाख डोलने लगी। कहीं दूर किरणों के तार झनझ्ना उठे, सपनो के स्वर डूबे धरती के गान में, लाखों ही लाख दिये ताारों के खो गए, पूरब के अधरों की हल्की मुस्कान में। कुछ ऐसे पूरब के गांव की हवा चली, सब रंगों की दुनियां आंख खोलने लगी। जमे …

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भिन्न – अनामिका

भिन्न - अनामिका

मुझे भिन्न कहते हैं किसी पाँचवीं कक्षा के क्रुद्ध बालक की गणित पुस्तिका में मिलूंगी – एक पाँव पर खड़ी – डगमग। मैं पूर्ण इकाई नहीं – मेरा अधोभाग मेरे माथे से सब भारी पड़ता है लोग मुझे मानते हैं ठीक ठाक अंग्रेजी में ‘प्रॉपर फ्रैक्शन’। अगर कहीं गलती से मेरा माथा मेरे अधोभाग से भारी पड़ जाता है लोगों के …

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भारतीय समाज – भवानी प्रसाद मिश्र

भारतीय समाज - भवानी प्रसाद मिश्र

कहते हैं इस साल हर साल से पानी बहुत ज्यादा गिरा पिछ्ले पचास वर्षों में किसी को इतनी ज्यादा बारिश की याद नहीं है। कहते हैं हमारे घर के सामने की नालियां इससे पहले इतनी कभी नहीं बहीं न तुम्हारे गांव की बावली का स्तर कभी इतना ऊंचा उठा न खाइयां कभी ऐसी भरीं, न खन्दक न नरबदा कभी इतनी …

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भर दिया जाम – बालस्वरूप राही

भर दिया जाम - बालस्वरूप राही

भर दिया जाम जब तुमने अपने हाथों से प्रिय! बोलो, मैं इन्कार करूं भी तो कैसे! वैसे तो मैं कब से दुनियाँ से ऊब चुका, मेरा जीवन दुख के सागर में डूब चुका, पर प्राण, आज सिरहाने तुम आ बैठीं तो– मैं सोच रहा हूँ हाय मरूं तो भी कैसे! मंजिल अनजानी पथ की भी पहचान नहीं, है थकी थकी–सी …

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