सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को। पहले तो लगा कि अब आईं तुम, आकर अब हँसी की लहरें काँपी दीवारों पर खिड़कियाँ खुलीं अब लिये किसी आनन को। पर कोई आया गया न कोई बोला खुद मैंने ही घर का दरवाजा खोला आदतवश आवाजें दीं सूनेपन को। फिर घर की खामोशी भर आई मन में चूड़ियाँ खनकती नहीं …
Read More »मत कहो, आकाश में कोहरा घना है: दुष्यंत कुमार
मत कहो, आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से, क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है। इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है, हर किसी का पाँँव घुटनों तक सना है। पक्ष औ’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है। रक्त वर्षों …
Read More »कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये: दुष्यंत कुमार
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये, कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये। यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये। न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये। ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही, …
Read More »हो गई है पीर पर्वत: दुष्यंत कुमार
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये …
Read More »एक सीढ़ी और: कुंवर बेचैन
एक सीढ़ी और चढ़ आया समय इस साल जाने छत कहाँ है। प्राण तो हैं प्राण जिनको देह–धनु से छूटना है, जिंदगी – उपवास जिसको शाम के क्षण टूटना है, हम समय के हाथ से छूटे हुए रूमाल, जाने छत कहाँ है। यह सुबह, यह शाम बुझते दीपकों की व्यस्त आदत और वे दिन–रात कोने से फटे जख्मी हुए ख़त …
Read More »एक पूरा दिन: राजीव कृष्ण सक्सेना
आज नहीं धन आशातीत कहीं से पाया‚ ना हीं बिछड़े साजन ने आ गले लगाया। शत्रु विजय कर नहीं प्रतिष्ठा का अधिकारी‚ कुछ भी तो उपलब्धि नहीं हो पाई भारी। साधारण सा दिन‚ विशेष कुछ बात नहीं थी‚ कोई जादू नहीं‚ नयन की घात नहीं थी। झलक नहीं पाते जो स्मृति के आभासों में‚ जिक्र नहीं होता है जिनका इतिहासों …
Read More »एक भी आँसू न कर बेकार: रामावतार त्यागी
एक भी आँसू न कर बेकार जाने कब समंदर मांगने आ जाए! पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है यह कहावत है‚ अमरवाणी नहीं है और जिस के पास देने को न कुछ भी एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है कर स्वयं हर गीत का श्रंगार जाने देवता को कौन सा भा जाय! चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण …
Read More »एक बूंद: अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी सोचने फिर फिर यही मन में लगी आह क्यों घर छोड़ कर मैं यों बढ़ी। दैव मेरे भाग्य में है क्या बदा मैं बचूंगी या मिलूंगी धूल में या जलूंगी गिर अंगारे पर किसी चू पड़ूंगी या कमल के फूल में। बह गई उस काल कुछ …
Read More »जब नींद नहीं आती होगी: रामेश्वर शुक्ल अंचल
क्या तुम भी सुधि से थके प्राण ले–लेकर अकुलाती होगी, जब नींद नहीं आती होगी! दिन भर के कार्य भार से थक – जाता होगा जूही–सा तन, श्रम से कुम्हला जाता होगा मृदु कोकाबेली–सा आनन। लेकर तन–मन की श्रांति पड़ी – होगी जब शय्या पर चंचल, किस मर्म वेदना से क्रंदन करता होगा प्रति रोम विकल, अाँखो के अम्बर से …
Read More »दूर का सितारा: निदा फ़ाज़ली
मैं बरसों बाद अपने घर को तलाश करता हुआ अपने घर पहुंचा लेकिन मेरे घर में अब मेरा घर कहीं नहीं था अब मेरे भाई अजनबी औरतों के शौहर बन चुके थे मेरे घर में अब मेरी बहनें अनजान मर्दों के साथ मुझसे मिलने आती थीं अपनेअपने दायरों में तक्.सीम मेरे भाई बहन का प्यार अब सिर्फ तोहफों का लेनदेन …
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