Poems In Hindi

बच्चों की हिन्दी कविताएं — 4to40 का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children. पढ़िए कुछ मजेदार, चुलबुली, नन्ही और बड़ी हिंदी कविताएँ. इस संग्रह में आप को बच्चो और बड़ो के लिए ढेर सारी कविताएँ मिलेंगी.

जब नींद नहीं आती होगी: रामेश्वर शुक्ल अंचल

जब नींद नहीं आती होगी: रामेश्वर शुक्ल अंचल

क्या तुम भी सुधि से थके प्राण ले–लेकर अकुलाती होगी, जब नींद नहीं आती होगी! दिन भर के कार्य भार से थक – जाता होगा जूही–सा तन, श्रम से कुम्हला जाता होगा मृदु कोकाबेली–सा आनन। लेकर तन–मन की श्रांति पड़ी – होगी जब शय्या पर चंचल, किस मर्म वेदना से क्रंदन करता होगा प्रति रोम विकल, अाँखो के अम्बर से …

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दूर का सितारा: निदा फ़ाज़ली

दूर का सितारा: निदा फ़ाज़ली

मैं बरसों बाद अपने घर को तलाश करता हुआ अपने घर पहुंचा लेकिन मेरे घर में अब मेरा घर कहीं नहीं था अब मेरे भाई अजनबी औरतों के शौहर बन चुके थे मेरे घर में अब मेरी बहनें अनजान मर्दों के साथ मुझसे मिलने आती थीं अपने­अपने दायरों में तक्.सीम मेरे भाई­ बहन का प्यार अब सिर्फ तोहफों का लेन­देन …

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चिट्ठी है किसी दुखी मन की: कुंवर बेचैन

चिट्ठी है किसी दुखी मन की: कुंवर बेचैन

बर्तन की यह उठका पटकी यह बात बात पर झल्लाना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। यह थकी देह पर कर्मभार इसको खांसी उसको बुखार जितना वेतन उतना उधार नन्हें मुन्नों को गुस्से में हर बार मार कर पछताना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। इतने धंधे यह क्षीणकाय ढोती ही रहती विवश हाय खुद ही उलझन खुद ही उपाय …

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बाल-कविताओं का संग्रह: प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Prabhudayal Shrivastav

यजमान कंजूस‌: प्रभुदयाल श्रीवास्तव बरफी ठूंस ठूंस कर खाई। सात बार रबड़ी मंगवाई। एक भगोना पिया रायता। बीस पुड़ी का लिया जयका। चार भटों का भरता खाया। दो पत्तल चाँवल मंगवाया। जल पीने पर आई डकार। छुआ पेट को बारंबार। बोले नहीं पिलाया जूस। यह यजमान बहुत कंजूस। ~ प्रभुदयाल श्रीवास्तव

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कानाफूसी: राम विलास शर्मा

कानाफूसी – राम विलास शर्मा

सुना आपने? चांद बहेलिया जाल रुपहला कंधे पर ले चावल की कनकी बिखेर कर बाट जोहता रहा रात भर, किंतु न आईं नीड़ छोड़ कर रंग बिरंगी किरण बयाएं! सुना आपने? सुना आपने? फाग खेलने क्ंवारी कन्याएं पलास की केशर घुले कटोरे कर मे लिये ताकती खड़ी रह गईं, ऋतुओं का सम्राट पहन कर पीले चीवर बौद्ध हो गया! सुना …

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दीदी के धूल भरे पाँव: धर्मवीर भारती

दीदी के धूल भरे पाँव: धर्मवीर भारती

दीदी के धूल भरे पाँव बरसों के बाद आज फिर यह मन लौटा है क्यों अपने गाँव; अगहन की कोहरीली भोर: हाय कहीं अब तक क्यों दूख दूख जाती है मन की कोर! एक लाख मोती, दो लाख जवाहर वाला, यह झिलमिल करता महानगर होते ही शाम कहाँ जाने बुझ जाता है – उग आता है मन में जाने कब …

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दिवा स्वप्न: राम विलास शर्मा

दिवा स्वप्न: राम विलास शर्मा

वर्षा से धुल कर निखर उठा नीला नीला फिर हरे हरे खेतों पर छाया आसमान‚ उजली कुँआर की धूप अकेली पड़ी हार में‚ लौटे इस बेला सब अपने घर किसान। पागुर करती छाहीं में कुछ गंभीर अधखुली आँखों से बैठी गायें करती विचार‚ सूनेपन का मधु–गीत आम की डाली में‚ गाती जातीं भिन्न कर ममाखियाँँ लगातार। भर रहे मकाई ज्वार …

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धुंधली नदी में: धर्मवीर भारती

धुंधली नदी में: धर्मवीर भारती

आज मैं भी नहीं अकेला हूं शाम है‚ दर्द है‚ उदासी है। एक खामोश सांझ–तारा है दूर छूटा हुआ किनारा है इन सबों से बड़ा सहारा है। एक धुंधली अथाह नदिया है और भटकी हुई दिशा सी है। नाव को मुक्त छोड़ देने में और पतवार तोड़ देने में एक अज्ञात मोड़ लेने में क्या अजब–सी‚ निराशा–सी‚ सुख–प्रद‚ एक आधारहीनता–सी …

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देखो, टूट रहा है तारा: हरिवंश राय बच्चन

देखो, टूट रहा है तारा: हरिवंश राय बच्चन

देखो, टूट रहा है तारा। नभ के सीमाहीन पटल पर एक चमकती रेखा चलकर लुप्त शून्य में होती-बुझता एक निशा का दीप दुलारा। देखो, टूट रहा है तारा। हुआ न उडुगन में क्रंदन भी, गिरे न आँसू के दो कण भी किसके उर में आह उठेगी होगा जब लघु अंत हमारा। देखो, टूट रहा है तारा। यह परवशता या निर्ममता …

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धूप ने बुलाया: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया। ताते जल नहा, पहन श्वेत वसन आई खुले लॉन बैठ गई दमकती लुनाई सूरज खरगोश धवल गोद उछल आया। बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया। नभ के उद्यान­छत्र­तले मेघ टीला पड़ा हरा फूल कढ़ा मेजपोश पीला वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया। पैरों में मखमल …

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