चिट्ठी है किसी दुखी मन की: कुंवर बेचैन

चिट्ठी है किसी दुखी मन की: कुंवर बेचैन

बर्तन की यह उठका पटकी
यह बात बात पर झल्लाना
चिट्ठी है किसी दुखी मन की।

यह थकी देह पर कर्मभार
इसको खांसी उसको बुखार
जितना वेतन उतना उधार
नन्हें मुन्नों को गुस्से में
हर बार मार कर पछताना
चिट्ठी है किसी दुखी मन की।

इतने धंधे यह क्षीणकाय
ढोती ही रहती विवश हाय
खुद ही उलझन खुद ही उपाय
आने पर किसी अतिथि जन के
दुख में भी सहसा हँस जाना
चिट्ठी है किसी दुखी मन की।

∼ कुंवर बेचैन

आपको कुंवर बेचैन जी की यह कविता “चिट्ठी है किसी दुखी मन की” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

यदि आपके पास Hindi / English में कोई poem, article, story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें। हमारी Id है: submission@sh035.global.temp.domains. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ publish करेंगे। धन्यवाद!

Check Also

Garh Ganesh Fair: Nahargarh Fort, Jaipur, Rajasthan

Garh Ganesh Fair: Nahargarh Fort, Jaipur, Rajasthan

Garh Ganesh Mela – a day before Ganesh Chaturthi, its a major fair held at …