Poems In Hindi

बच्चों की हिन्दी कविताएं — 4to40 का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children. पढ़िए कुछ मजेदार, चुलबुली, नन्ही और बड़ी हिंदी कविताएँ. इस संग्रह में आप को बच्चो और बड़ो के लिए ढेर सारी कविताएँ मिलेंगी.

सतपुड़ा के घने जंगल – भवानी प्रसाद मिश्र

सतपुड़ा के घने जंगल नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। झाड़ ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मींचे, घास चुप है, कास चुप है, मूक शाल, पलाश चुप है; बन सके तो धँसो इनमें, धँस न पाती हवा जिनमें, सतपुड़ा के घने जंगल नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। सड़े पत्ते, गले पत्ते, हरे पत्ते, जले पत्ते, …

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सन्नाटा – भवानी प्रसाद मिश्र

तो पहले अपना नाम बता दूँ तुमको, फिर चुपके-चुपके धाम बता दूँ तुमको, तुम चौंक नहीं पड़ना, यदि धीमे धीमे, मैं अपना कोई काम बता दूँ तुमको। कुछ लोग भ्रान्तिवश मुझे शान्ति कहते हैं, निस्तब्ध बताते हैं, कुछ चुप रहते हैं, मैं शांत नहीं निस्तब्ध नहीं, फिर क्या हूँ, मैं मौन नहीं हूँ, मुझमें स्वर बहते हैं। कभी कभी कुछ …

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साधारण का आनंद – भवानी प्रसाद मिश्र

सागर से मिलकर जैसे नदी खारी हो जाती है तबीयत वैसे ही भारी हो जाती है मेरी सम्पन्नों से मिलकर व्यक्ति से मिलने का अनुभव नहीं होता ऐसा नहीं लगता धारा से धारा जुड़ी है एक सुगंध दूसरी सुगंध की ओर मुड़ी है तब कहना चाहिए सम्पन्न व्यक्ति व्यक्ति नहीं है वह सच्ची कोई अभिव्यक्ति नहीं है कई बातों का …

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जाहिल मेरे बाने – भवानी प्रसाद मिश्र

मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पाँवों चलता हूँ मैं असभ्य हूँ क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूँ मैं असभ्य हूँ क्योंकि चीरकर धरती धान उगाता हूँ मैं असभ्य हूँ क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूँ आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर आप …

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रम्भा – रामधारी सिंह दिनकर

सहजन्ये! पर, हम परियों का इतना भी रोना क्या? किसी एक नर के निमित्त इतना धीरज खोना क्या? प्रेम मानवी की निधि है अपनी तो वह क्रीड़ा है; प्रेम हमारा स्वाद, मानवी की आकुल पीड़ा है जनमीं हम किस लिए ? मोद सब के मन मे भरने को। किसी एक को नहीं मुग्ध जीवन अर्पित करने को। सृष्टि हमारी नहीं संकुचित …

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उर्वशी (नर प्रेम – नारी प्रेम) – रामधारी सिंह दिनकर

इसमे क्या आश्चर्य? प्रीति जब प्रथम–प्रथम जगती है‚ दुर्लभ स्वप्न–समान रम्य नारी नर को लगती है। कितनी गौरवमयी घड़ी वह भी नारी जीवन की‚ जब अजेय केसरी भूल सुधबुध समस्त तन मन की‚ पद पर रहता पड़ा‚ देखता अनिमिष नारी मुख को‚ क्षण–क्षण रोमाकुलित‚ भोगता गूढ़ अनिर्वच सुख को! यही लग्न है वह जब नारी‚ जो चाहे‚ वह पा ले‚ …

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आशा का दीपक – रामधारी सिंह दिनकर

यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से शुरू हुई आराध्य भूमि यह क्लांत नहीं रे राही; और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग से बाकी होश तभी …

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निर्वाण षटकम् – आदि शंकराचार्य

मनोबुद्धय्हंकार चित्तानि नाहं श्रोत्रजिव्हे न च घ्राणनेत्रे न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम ॥1॥ मैं न तो मन हूं‚ न बुद्धि‚ न अहांकार‚ न ही चित्त हूं मैं न तो कान हूं‚ न जीभ‚ न नासिका‚ न ही नेत्र हूं मैं न तो आकाश हूं‚ न धरती‚ न अग्नि‚ न ही वायु हूं मैं तो मात्र शुद्ध …

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रेशमी नगर – रामधारी सिंह दिनकर

रेशमी कलम से भाग्य–लेख लिखने वाले तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोए हो? बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने में तुम भी क्या घर भर पेट बाँधकर सोये हो? असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में क्या अनायास जल में बह जाते देखा है? ‘क्या खायेंगे?’ यह सोच निराशा से पागल बेचारों को नीरव रह जाते देखा है? …

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शक्ति और क्षमा – रामधारी सिंह दिनकर

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा, पर नर-व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ, कब हारा? क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनत जितना ही, दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही। अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है। क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो …

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