परमगुरु – अनामिका

मैं नहीं जानती कि सम्य मेरी आँखों का था
या मेरे भौचक्के चेहरे का,
लेकिन सरकारी स्कूल की
उस तीसरी पाँत की मेरी कुर्सी पर
तेज प्रकाल से खुदा था– ‘उल्लू’
मरी हुई लाज से
कभी हाथ उस पर रखती, कभी कॉपी
लेकिन पट्ठा ऐसा था–
छुपने का नाम ही नहीं लेता था !

धीरे–धीरे हुआ ऐसा–
खुद गया मेरा वह उपानम
मेरे वज़ूद पर !
और मैंने उसको जगह दे दी–
कोटर में– अपने ही भीतर !
तब से मैंने जो भी किया
उसमे उस परमगुरु का
इशारा भी शामिल था !

फिर एक दिन जाने क्या हुआ–
मेरे भीतर का वह उल्लू उड़ गया,
और वहाँ रहने चला आया
सावधान पंजों वाला एक काला बिलौटा !

एक उमर जीने के बाद मैंने गौर किया
उल्लूपंथी वाले दिन कितने अच्छे थे !
हमारे अँधेरे समय में
उल्लू की आँख भर ही तो बची है–
अगर बची है कहीं रोशनी,
इसीलिये उल्लू बनने में
नहीं होनी चाहिये शर्मिन्दगी !
कैसे हम भूल जाएँ आखिर
कि उल्लू बनने की प्रक्रिया
में शामिल है आदमी का
आदमी पर भरोसा !

∼ अनामिका

About Anamika

अनामिका (जन्म– 17 अगस्त 1961, मुजफ्फरपुर, बिहार) आधुनिक समय में हिन्दी भाषा की प्रमुख कवयित्री, आलोचक, अनुवादक, कहानीकार और उपन्यासकार हैं। शिक्षा– दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी साहित्य में एम.ए., पी.एचडी., डी० लिट्। अध्यापन– अँग्रेजी विभाग, सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका होने के बावजूद अनामिका ने हिन्दी कविता को समृद्ध करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। समकालीन हिन्दी कविता की चंद सर्वाधिक चर्चित कवयित्रियों में वे शामिल की जाती हैं। प्रमुख कृतियाँ– 1. पोस्ट-एलियट पोएट्री : अ वोएज फ्रॉम कॉन्फ्लिक्ट टु आइसोलेशन (आलोचना), 2. डन क्रिटिसिज्म डाउन द एजेज (आलोचना), 3. ट्रीटमेंट ऑफ लव ऐण्ड डेथ इन पोस्टवार अमेरिकन विमेन पोएट्स (आलोचना), 4. समकालीन अंग्रेजी कविता (अनुवाद), 5. पर कौन सुनेगा (उपन्यास) 6. मन कृष्ण : मन अर्जुन (उपन्यास), 7. प्रतिनायक (कथा संग्रह), 8. समय के शहर में (कविता-संग्रह)। पुरस्कार/सम्मान– राष्ट्रभाषा परिषद् पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गिरिजाकुमार माथुर पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान द्विजदेव सम्मान केदार सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित हैं। प्रख्यात आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय के अनुसार “भारतीय समाज एवं जनजीवन में जो घटित हो रहा है और घटित होने की प्रक्रिया में जो कुछ गुम हो रहा है, अनामिका की कविता में उसकी प्रभावी पहचान और अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।” वहीं दिविक रमेश के कथनानुसार “अनामिका की बिंबधर्मिता पर पकड़ तो अच्छी है ही, दृश्य बंधों को सजीव करने की उनकी भाषा भी बेहद सशक्त है।”

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