जाग–जागे सपने भागे आँचल पर बरसात मैं होती हूँ, तुम होते हो सारी सारी रात। नीम–हकीम मर गया कब का घर आँगन बीमार बाबू जी तो दस पैसा भी समझे हैं दीनार ऊब गयी हूँ कह दूंगी मैं ऐसी–वैसी बात। दादी ठहरीं भीत पुरानी दिन दो दिन मेहमान गुल्ली–डंडा खेल रहे हैं बच्चे हैं नादान टूटी छाजन झेल न पाएगी …
Read More »गीली शाम – चन्द्रदेव सिंह
तुम तो गये केवल शब्दों के नाम पलकों की अरगनी पर टांग गये शाम। एक गीली शाम। हिलते हवाओं में तिथियों के लेखापत्र एक–एक कर सारे फट गये केवल पीलपन – पीलापन मुंडेरों पर‚ फसलें पर‚ पेड़ों पर सूरज के और रंग किरनों से छंट गये। बूढ़ी ऋतुओं को हो चला है जुकाम। तुम तो दे गये केवल शब्दों के …
Read More »पीर मेरी – वीरेंद्र मिश्र
पीर मेरी कर रही ग़मग़ीन मुझको और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीर, रानी और उससे भी अधिक हर पांव की जंजीर, रानी। एक ठंडी सांस की डोरी मुझे बांधे बंधनों का भार तेरा प्यार है साधे भार अपना कुछ नहीं, देखें अगर उनको जा रहे जो मौन पर्वत पीठ पर लादे भूल मेरी कर रही ग़मग़ीन मुझको और …
Read More »याचना – रघुवीर सहाय
युक्ति के सारे नियंत्रण तोड़ डाले‚ मुक्ति के कारण नियम सब छोड़ डाले‚ अब तुम्हारे बंधनों की कामना है। विरह यामिनि में न पल भर नींद आयी‚ क्यों मिलन के प्रात वह नैनों समायी‚ एक क्षण में ही तो मिलन में जागना है। यह अभागा प्यार ही यदि है भुलाना‚ तो विरह के वे कठिन क्षण भूल जाना‚ हाय जिनका …
Read More »यह बात किसी से मत कहना – देवराज दिनेश
तेरे पिंजरे का तोता तू मेरे पिंजरे की मैना यह बात किसी से मत कहना। मैं तेरी आंखों में बंदी तू मेरी आंखों में प्रतिक्षण मैं चलता तेरी सांस–सांस तू मेरे मानस की धड़कन मैं तेरे तन का रत्नहार तू मेरे जीवन का गहना! यह बात किसी से मत कहना!! हम युगल पखेरू हंस लेंगे कुछ रो लेंगे कुछ गा …
Read More »यह बच्चा कैसा बच्चा है – इब्ने इंशा
यह बच्चा कैसा बच्चा है यह बच्चा काला-काला-सा यह काला-सा, मटियाला-सा यह बच्चा भूखा-भूखा-सा यह बच्चा सूखा-सूखा-सा यह बच्चा किसका बच्चा है यह बच्चा कैसा बच्चा है जो रेत पर तन्हा बैठा है ना इसके पेट में रोटी है ना इसके तन पर कपड़ा है ना इसके सर पर टोपी है ना इसके पैर में जूता है ना इसके पास …
Read More »कल्पना और जिंदगी – वीरेंद्र मिश्र
दूर होती जा रही है कल्पना पास आती जा रही है ज़िंदगी चाँद तो आकाश में है तैरता स्वप्न के मृगजाल में है घेरता उठ रहा तूफान सागर में यहाँ डगमगाती जा रही है ज़िंदगी साथ में लेकर प्रलय की चाँदनी चीखते हो तुम कला की रागिनी दे रहा धरना यहाँ संघर्ष है तिलमिलाती जा रही है ज़िंदगी स्वप्न से …
Read More »मेरा गाँव – किशोरी रमण टंडन
वो पनघट पे जमघट‚ वो सखियों की बातें वो सोने के दिन और चाँदी–सी रातें वो सावन की रिमझिम‚ वो बाग़ों के झूले वो गरमी का मौसम‚ हवा के बगूले वो गुड़िया के मेले‚ हज़ारों झमेले कभी हैं अकेले‚ कभी हैं दुकेले मुझे गाँव अपना बहुत याद आता। वो ढोलक की थापें‚ वो विरह वो कजरी वो बंसी की तानें‚ …
Read More »विप्लव गान – बालकृष्ण शर्मा ‘नविन’
कवि‚ कुछ ऐसी तान सुनाओ— जिससे उथल–पुथल मच जाये! एक हिलोर इधर से आये— एक हिलोर उधर से आये; प्राणों के लाले पड़ जाएं त्राहि–त्राहि रव नभ में छाये‚ नाश और सत्यानाशों का धुआंधार जग में छा जाये‚ बरसे आग जलद् जल जायें‚ भस्मसात् भूधर हो जायें‚ पाप–पुण्य सदसद्भावों की धूल उड़ उठे दायें–बायें‚ नभ का वक्षःस्थल फट जाये‚ तारे …
Read More »उतना तुम पर विश्वास बढ़ा – रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’
बाहर के आंधी पानी से मन का तूफान कहीं बढ़कर‚ बाहर के सब आघातों से‚ मन का अवसान कहीं बढ़कर‚ फिर भी मेरे मरते मन ने तुम तक उड़ने की गति चाही‚ तुमने अपनी लौ से मेरे सपनों की चंचलता दाही‚ इस अनदेखी लौ ने मेरी बुझती पूजा में रूप गढ़ा‚ जितनी तुम ने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास …
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