Poems In Hindi

बच्चों की हिन्दी कविताएं — 4to40 का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children. पढ़िए कुछ मजेदार, चुलबुली, नन्ही और बड़ी हिंदी कविताएँ. इस संग्रह में आप को बच्चो और बड़ो के लिए ढेर सारी कविताएँ मिलेंगी.

नाव चलती रही – वीरबाला भावसार

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही। कौन सी रागनी बज रही है यहां देह से अजनबी प्राण से अजनबी क्या अजनबी रागनी के लिये जिंदगी की त्वरा यूँ मचलती रही नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही। रुक गए यूँ कदम मुद के देखूं जरा है वहां …

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मन पाखी टेरा रे – वीरबाला भावसार

रुक रुक चले बयार, कि झुक झुक जाए बादल छाँह कोई मन सावन घेरा रे, कोई मन सावन घेरा रे ये बगुलों की पांत उडी मन के गोले आकाश कोई मन पाखी टेरा रे कोई मन पाखी टेरा रे कौंध कौंध कर चली बिजुरिया, बदल को समझने बीच डगर मत छेड़ लगी है, पूर्व हाय लजाने सहमे सकुचे पांव, कि …

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मन ऐसा अकुलाया – वीरबाला भावसार

एक चिरैया बोले, हौले आँगन डोले मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया। चन्दन धुप लिपा दरवाज़ा, चौक पूरी अँगनाई बड़े सवेरे कोयल कुहुकी, गूंज उठी शहनाई भोर किरण क्या फूटी, मेरी निंदिया टूटी मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया। झर झर पात जहर रहे मन के, एकदम सूना सूना कह तो देती मन ही पर, दुःख …

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वो सुबह कभी तो आएगी – साहिर लुधियानवी

वो सुबह कभी तो आएगी। इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी वो सुबह कभी तो आएगी। जिस सुबह की खातिर युग युग से, हम सब मर मर कर जीते हैं जिस सुबह की अनृत की धुन …

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कभी कभी – साहिर लुधियानवी

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि जिंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाओं में गुज़रने पाती तो शादाब भी हो सकती थी ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है तेरी नज़र की शुआओ में खो भी सकती थी अजब न था कि मैं बेगाना–ऐ–आलम रहकर तेरे जमाल की रानाइयों में खो रहता तेरा गुदाज़ बदन‚ तेरी नीम–बाज़ …

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खून फिर खून है – साहिर लुधियानवी

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है खून फिर खून है टपकेगा तो जम जाएगा तुमने जिस खून को मक्तल में दबाना चाहा आज वह कूचा–ओ–बाज़ार में आ निकला है कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर खून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से जिस्म की मौत कोई …

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उठो लाल अब आँखें खोलो – शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

उठो लाल अब आंखें खोलो अपनी बदहालत पर रोलो पानी तो उपलब्ध नहीं है चलो आंसुओं से मुँह धोलो॥ कुम्हलाये पौधे बिन फूले सबके तन सिकुड़े मुंह फूले बिजली बिन सब काम ठप्प है बैठे होकर लँगड़े लूले बेटा उठो और जल्दी से नदिया से कुछ पानी ढ़ोलो॥ बीते बरस पचास प्रगति का सूरज अभी नहीं उग पाया जिसकी लाठी …

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मौन निमंत्रण – सुमित्रानंदन पंत

स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार चकित रहता शिशु सा नादान, विश्व के पलकों पर सुकुमार विचरते हैं जब स्वप्न अजान; न जाने नक्षत्रों से कौन निमंत्रण देता मुझको मौन! सघन मेघों का भीमाकाश गरजता है जब तमसाकार, दीर्घ भरता समीर निःश्वास प्रखर झरती जब पावस-धार; न जाने, तपक तड़ित में कौन मुझे इंगित करता तब मौन! देख वसुधा का यौवन …

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सृष्टि – सुमित्रानंदन पंत

मिट्टी का गहरा अंधकार, डूबा है उस में एक बीज वह खो न गया, मिट्टी न बना कोदों, सरसों से शुद्र चीज! उस छोटे उर में छुपे हुए हैं डाल–पात औ’ स्कन्ध–मूल गहरी हरीतिमा की संसृति बहु रूप–रंग, फल और फूल! वह है मुट्ठी में बंद किये वट के पादप का महाकार संसार एक! आशचर्य एक! वह एक बूंद, सागर …

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मैं सबसे छोटी होऊं – सुमित्रानंदन पंत

मैं सबसे छोटी होऊँ तेरी गोदी में सोऊँ तेरा आँचल पकड़-पकड़कर फिरू सदा माँ तेरे साथ कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ बड़ा बनाकर पहले हमको तू पीछे छलती है माँ हाथ पकड़ फिर सदा हमारे साथ नहीं फिरती दिन-रात अपने कर से खिला, धुला मुख धूल पोंछ, सज्जित कर गात थमा खिलौने, नहीं सुनाती हमें सुखद परियों की बात ऐसी …

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