शीशे का घर – श्रीकृष्ण तिवारी

जब तक यह शीशे का घर है
तब तक ही पत्थर का डर है
आँगन–आँगन जलता जंगल
द्वार–द्वार सर्पों का पहरा
बहती रोशनियों में लगता
अब भी कहीं अँधेरा ठहरा।

जब तक यह बालू का घर है
तब तक ही लहरों का डर है
टहनी–टहनी टंगा हुआ है
जख्म भरे मौसम का चेहरा
गलियों में सन्नाटा पसरा।

जब तक यह काज़ल का घर है
तब तक ही दागों का घर है
धरती पल–पल दहक रही है
जर्रा–जर्रा पिघल रहा है
चांद सूर्य को कोई अजगर
धीरे–धीरे निगल रहा है।

जब तक यह बारूदी घर है
तब तक चिनगारी का डर है।

∼ श्रीकृष्ण तिवारी

About 4to40.com

Check Also

From The Heart of A Teacher - Sailaja Saxena

From The Heart of A Teacher: Sailaja Saxena Short English Poetry

From The Heart of A Teacher: Teacher is the who teaches us knowledge, moral values …