तेरे पिंजरे का तोता तू मेरे पिंजरे की मैना यह बात किसी से मत कहना। मैं तेरी आंखों में बंदी तू मेरी आंखों में प्रतिक्षण मैं चलता तेरी सांस–सांस तू मेरे मानस की धड़कन मैं तेरे तन का रत्नहार तू मेरे जीवन का गहना! यह बात किसी से मत कहना!! हम युगल पखेरू हंस लेंगे कुछ रो लेंगे कुछ गा …
Read More »यह बच्चा कैसा बच्चा है – इब्ने इंशा
यह बच्चा कैसा बच्चा है यह बच्चा काला-काला-सा यह काला-सा, मटियाला-सा यह बच्चा भूखा-भूखा-सा यह बच्चा सूखा-सूखा-सा यह बच्चा किसका बच्चा है यह बच्चा कैसा बच्चा है जो रेत पर तन्हा बैठा है ना इसके पेट में रोटी है ना इसके तन पर कपड़ा है ना इसके सर पर टोपी है ना इसके पैर में जूता है ना इसके पास …
Read More »कल्पना और जिंदगी – वीरेंद्र मिश्र
दूर होती जा रही है कल्पना पास आती जा रही है ज़िंदगी चाँद तो आकाश में है तैरता स्वप्न के मृगजाल में है घेरता उठ रहा तूफान सागर में यहाँ डगमगाती जा रही है ज़िंदगी साथ में लेकर प्रलय की चाँदनी चीखते हो तुम कला की रागिनी दे रहा धरना यहाँ संघर्ष है तिलमिलाती जा रही है ज़िंदगी स्वप्न से …
Read More »मेरा गाँव – किशोरी रमण टंडन
वो पनघट पे जमघट‚ वो सखियों की बातें वो सोने के दिन और चाँदी–सी रातें वो सावन की रिमझिम‚ वो बाग़ों के झूले वो गरमी का मौसम‚ हवा के बगूले वो गुड़िया के मेले‚ हज़ारों झमेले कभी हैं अकेले‚ कभी हैं दुकेले मुझे गाँव अपना बहुत याद आता। वो ढोलक की थापें‚ वो विरह वो कजरी वो बंसी की तानें‚ …
Read More »विप्लव गान – बालकृष्ण शर्मा ‘नविन’
कवि‚ कुछ ऐसी तान सुनाओ— जिससे उथल–पुथल मच जाये! एक हिलोर इधर से आये— एक हिलोर उधर से आये; प्राणों के लाले पड़ जाएं त्राहि–त्राहि रव नभ में छाये‚ नाश और सत्यानाशों का धुआंधार जग में छा जाये‚ बरसे आग जलद् जल जायें‚ भस्मसात् भूधर हो जायें‚ पाप–पुण्य सदसद्भावों की धूल उड़ उठे दायें–बायें‚ नभ का वक्षःस्थल फट जाये‚ तारे …
Read More »उतना तुम पर विश्वास बढ़ा – रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’
बाहर के आंधी पानी से मन का तूफान कहीं बढ़कर‚ बाहर के सब आघातों से‚ मन का अवसान कहीं बढ़कर‚ फिर भी मेरे मरते मन ने तुम तक उड़ने की गति चाही‚ तुमने अपनी लौ से मेरे सपनों की चंचलता दाही‚ इस अनदेखी लौ ने मेरी बुझती पूजा में रूप गढ़ा‚ जितनी तुम ने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास …
Read More »याद आती रही – प्रभा ठाकुर
आंख रह–रह मेरी डबडबाती रही‚ हम भुलाते रहे याद आती रही! प्राण सुलगे‚ तो जैसे धुआं छा गया। नैन भीगे‚ ज्यों प्यासा कुआं पा गया। रोते–रोते कोई बात याद आ गई‚ अश्रु बहते रहे‚ मुसकुराती रही! सांझ की डाल पर सुगबुगाती हवा‚ फिर मुझे दृष्टि भरकर किसी ने छुआ‚ घूम कर देखती हूं‚ तो कोई नहीं‚ मेरी परछाई मुझको चिढ़ाती …
Read More »कहने को घर अब भी है – वीरेंद्र मिश्र
कहने को घर अब भी है, पर उस से छूट गई कुछ चीजें। आते–जाते हवा कि जैसे अटक गई है बालकनी में सूंघ गया है सांप फर्श को दर्द बढ़ा छत की धमनी में हर जाने–आने वाले पर हंसती रहती हैं दहलीजें। कब आया कैसे आया पर यह बदलाव साफ़ है अब तो मौसम इतना हुआ बेरहम कुछ भी नहीं …
Read More »सूरज डूब गया बल्ली भर – नरेंद्र शर्मा
सूरज डूब गया बल्ली भर– सागर के अथाह जल में। एक बाँस भर उग आया है– चांद, ताड़ के जंगल में। अगणित उंगली खोल, ताड़ के पत्र, चांदनी में डोले, ऐसा लगा, ताड़ का जंगल सोया रजत–छत्र खोले कौन कहे, मन कहाँ-कहाँ हो आया, आज एक पल में। बनता मन का मुकुर इंदु, जो मौन गगन में ही रहता, बनता …
Read More »ज्योति कलश छलके – नरेंद्र शर्मा
ज्योति कलश छलके हुए गुलाबी लाल सुनहरे रंग दल बादल के ज्योति कलश छलके। घर आंगन बन उपवन उपवन करती ज्योति अमृत से सिंचन मंगल घट ढलके ज्योति कलश छलके। पात पात बिरवा हरियाला धरती का मुख हुआ उजाला सच सपने कल के ज्योति कलश छलके। ऊषा ने आंचल फैलाया फैली सुख की शीतल छाया नीचे आंगन के ज्योति कलश …
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