सोच-समझकर करो 'खर्च': Spend wisely - Hindi Story on Habits For Financial Wellbeing

सोच-समझकर करो ‘खर्च’: Spend wisely – Hindi Story on Habits For Financial Wellbeing

सुभाष और त्रिभुवन दोनों 12वीं कक्षा के छात्र थे। दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे। दोनों ने मैडीकल ग्रुप ले रखा था। सुभाष के मम्मी-पापा एक सरकारी विभाग में नौकरी करते थे और त्रिभुवन के पापा का व्यापार था, जिससे उनकी काफी अच्छी आमदनी हो जाती थी।

सोच-समझकर करो ‘खर्च’: Spend wisely

सुभाष के मम्मी-पापा के घर में सभी सुख-सुविधाएं थीं, लेकिन उन्होंने सुभाष को बहुत सोच-समझकर पैसे खर्च करने की शिक्षा दी हुई थी।

परंतु त्रिभुवन की आदतें सुभाष से बिल्कुल उलट थीं। वह बिना सोचे-समझे खुलकर खर्च करता था। उन दोनों ने बहुत अच्छे अंक लेकर 12वीं कक्षा उत्तीर्ण की। दोनों के मम्मी-पापा ने आपस में विचार-विमर्श करके उन्हें पी.एम.टी. की कोचिंग दिलवाने के लिए एक बड़े शहर के कोचिंग सैंटर में भेज दिया।

सुभाष अपने मम्मी-पापा द्वारा दी गई नसीहत के अनुसार दिल लगाकर पढ़ाई करता। कोई भी पीरियड नहीं छोड़ता। कॉलेज से हॉस्टल और हॉस्टल से कॉलेज जाता। विशेष कार्य पड़ने पर ही वह बाजार या फिर किसी और स्थान पर जाता। परंतु त्रिभुवन बड़े शहर में जाते ही अपने मम्मी-पापा द्वारा दी गई नसीहत भूल गया। उसका ध्यान पढ़ाई की बजाय घूमने-फिरने में ज्यादा लगने लगा। वह अपने मित्रों के साथ बाजार और कैंटीन में जाकर खुलकर खर्च करने लगा।

वह अपने पीरियड छोड़कर भी अपने मित्रों के साथ घूमने-फिरने चला जाता। वह इतना खुलकर खर्च करता कि उसके क्रैडिट कार्ड की लिमिट जल्दी खत्म हो जाती। जब वह अपने पापा से अपने क्रैडिट कार्ड में पैसे डालने के लिए कहता, तो उसके पापा उसे कहते, “बेटे, तुम बहुत ज्यादा पैसे खर्च कर रहे हो। ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हारी आदतें खराब होती जा रही हैं। बेटा, तुम जिस लक्ष्य को लेकर गए हुए हो, उसे मत भूलना।”

वह झूठ-सच बोलकर अपने पापा के सामने अपनी गलतियों को ढक लेता। उसके पापा भी उसकी बातों में आ जाते। त्रिभुवन जब भी सुभाष को अपने साथ चलने को कहता, तो सुभाष कोई-न-कोई बहाना लगाकर उसके साथ जाने से मना कर देता। सुभाष ने उसे बुरी आदतें छोड़ देने के लिए कई बार कहा भी, परंतु उसमें कोई सुधार नहीं आया।

एक दिन त्रिभुवन सुभाष पर बहुत जोर डालकर उसे एक रैस्टोरैंट में ले ही गया। साथ में उसके चार दोस्त भी थे। जब वह खाना खाकर पैसे देने लगा, तो उसकी जेब से उसका पर्स नहीं निकला, क्योंकि वह अपना पर्स अपने कमरे में भूल आया था। उसका क्रैडिट कार्ड भी उसके पर्स में ही था।

उसने अपने मित्रों से रैस्टोरैंट का बिल चुकाने के लिए कहा, परंतु सभी ने कोई-न-कोई बहाना लगाकर पैसे देने से मना कर दिया। आखिर उसने सुभाष से रैस्टोरैंट के पैसे देने के लिए कहा।

सुभाष ने यह कहकर कि उसे कमरे में जाकर उसके पैसे लौटाने पड़ेंगे, अपने क्रैडिट कार्ड से बिल चुका दिया। जब त्रिभुवन सुभाष के कमरे में उसे पैसे लौटाने आया, तो उसने आश्चर्य से पूछा, “सुभाष, मुझे तो पता ही नहीं था कि तुम्हारे पास भी क्रैडिट कार्ड है। तुमने कभी बताया ही नहीं।”

सुभाष मुस्कुराकर बोला, “मित्र, हमारे माता-पिता ने यह क्रैडिट कार्ड पढ़ाई की जरूरतों के लिए दिया है, फिजूलखर्ची के लिए नहीं इसलिए मैं इसका उपयोग केवल आवश्यकता पड़ने पर ही करता हूं।”

“हमारा कर्त्तव्य है कि हम इस क्रैडिट कार्ड का प्रयोग सोच-समझकर करें। तुमने अपने मित्रों को देख लिया, सभी पैसे देने से मना कर गए। मैं तुम्हारी तरह बेमतलब क्रैडिट कार्ड का प्रयोग नहीं करता।”

त्रिभुवन को सुभाष की बातें समझ आ गईं। उसकी आंखें खुल गईं। उसे क्रैडिट कार्ड के प्रयोग का सही अर्थ समझ आ गया। उसने अपने मम्मी-पापा को सारी बात बता दी, अपनी गलती मान ली और आगे से क्रैडिट कार्ड का प्रयोग सोच-समझकर करने का फैसला कर लिया।

~ प्रिंसिपल विजय कुमार

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