मोटापा: शरीर की नहीं, जीवन की गड़बड़ी

मोटापा: शरीर की नहीं, जीवन की गड़बड़ी

आजकल मोटापे की बहुत चर्चा है। हर जगह डाइट, एक्सरसाइज और वजन कम करने की बातें हो रही हैं। लेकिन मन में एक सवाल उठता है कि क्या मोटापा सच में केवल शरीर की बीमारी है या कहीं यह हमारे जीने के तरीके की गड़बड़ी तो नहीं।

मोटापा: शरीर की नहीं, जीवन की गड़बड़ी

अगर हम थोड़ा पीछे लौटकर देखें तो हमारे दादा, परदादा दिनभर मेहनत करते थे, • घी खाते थे, • दूध पीते थे, • मोटा अनाज खाते थे, • फिर भी मोटे नहीं होते थे। आज स्थिति उल्टी है। • खाना कम, डाइट ज्यादा, फिर भी शरीर भारी। तो साफ़ है कि गड़बड़ी भोजन में नहीं, हमारे भीतर कहीं और है।

‘वेदों की दृष्टि में भोजन से पहले अग्नि का संतुलन सबसे बड़ा सत्य’

वेद कहते हैं कि अग्नि ही जीवन है। यह अग्नि केवल चूल्हे की आग नहीं, यह पाचन की वह शक्ति है, जो भोजन को ऊर्जा में बदलती है। पहले मन शांत था, इसलिए अग्नि भी संतुलित थी। आज मन अशांत है और अशांत मन अग्नि को कमजोर कर देता है। कमजोर अग्नि भोजन को शक्ति नहीं, चर्बी में बदल देती है। यहीं से मोटापा जन्म लेता है।

उपनिषद’ बताते हैं कि शरीर केवल दिखने वाला ढांचा नहीं होता और शरीर केवल एक स्तर का नहीं होता। एक स्थूल शरीर है, जो दिखाई देता है। एक सूक्ष्म शरीर है, जो महसूस होता है और एक कारण शरीर है, जहां से सब शुरू होता है। मोटापा स्थूल शरीर में दिखता है, लेकिन उसका जन्म सूक्ष्म शरीर में होता है। जब मन अशांत रहता है, भावनाएं दबाई जाती हैं और वृत्ति बाहर खोजी जाती है तो वही बोझ शरीर में उतर आता है।

‘अहिंसा’ का गहरा अर्थ, जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं।

हम अहिंसा की बात करते हैं, लेकिन अपने शरीर के साथ कितनी हिंसा करते हैं, इस पर कभी ध्यान नहीं देते। भूख न हो तब भी खाना, तनाव में खाना और फिर आईने के सामने खुद से नाराज होना। यह सब शरीर पर किया गया अन्याय है। अहिंसा का अर्थ केवल दूसरों को नुकसान न पहुँचाना नहीं, अहिंसा का अर्थ है अपने शरीर के साथ भी करुणा रखना।

‘एक्यूप्रेशर’ का सीधा और सरल विज्ञान:

एक्यूप्रेशर कहता है कि मोटापा पेट की समस्या नहीं, ऊर्जा की समस्या है। जब शरीर के ऊर्जा बिंदु निष्क्रिय हो जाते हैं तो शरीर संग्रह करने लगता है। पहले लोग जमीन पर बैठते थे, नंगे पांव चलते थे, जिससे शरीर स्वाभाविक रूप से संतुलन में रहता था। आज शरीर स्थिर है, मन अधिक है और ऊर्जा का प्रवाह रुका हुआ है।

धन को ही कमाना बनाम से जीवन का संतुलन कैसे बिगड़ता है।

आज व्यक्ति ने मान लिया है कि धन कमाना ही सच्चा कर्म है। धन जरूरी है — इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन धन सब कुछ नहीं है। जब जीवन का केंद्र सिर्फ कमाना बन जाता है तो मन पीछे छूट जाता है, सांस उखड़ने लगती है और आत्मा चुपचाप दर्शक बन जाती है। समाधान सिर्फ दवाइयों में नहीं, न ही केवल डाइट में। समाधान शुरू होता है alignment से, आत्मा, मन और साँस को फिर से एक दिशा में लाने से।

मानसिक थकान

आज का मनोविज्ञान यह मान चुका है कि एक साधारण व्यक्ति के मन में एक दिन में लगभग सात हजार विचार चलते हैं। इन विचारों में से हजारों विचार न तो जरूरी होते हैं, न उपयोगी और न ही जीवन को आगे बढ़ाने वाले। वे केवल मन को लगातार चलाते रहते हैं, बिना रुके, बिना दिशा के। यही कारण है कि आज व्यक्ति शारीरिक रूप से ज्यादा काम न करते हुए भी मानसिक रूप से बहुत जल्दी थक जाता है। मन जलता रहता है, सोच रुकती नहीं और भीतर एक अजीब-सी थकान जमा होने लगती है।

हम सभी जानते हैं कि जब कोई गाड़ी लगभग दस हजार किलोमीटर चल जाती है, तो उसकी व्हील बैलेंसिंग कराना जरूरी हो जाता है। अगर समय पर बैलेंसिंग न कराई जाए, तो टायर असमान रूप से घिसने लगते हैं। गाड़ी चल तो रही होती है, लेकिन धीरे-धीरे पूरा सिस्टम खराब होने लगता है।

लेकिन यही बात हम अपने मन, आत्मा और साँस पर लागू नहीं करते। मन रोज चलता है, सोच दिन-रात चलती है, जिंदगी बिना रुके आगे बढ़ती है, लेकिन व्यक्ति यह नहीं जानता कि मन, आत्मा और साँस की भी कोई बैलेंसिंग होती है।

नतीजा यह होता है कि दिमाग चलता-चलता घिस जाता है, मन थक जाता है और शरीर एक दिन बीमारी के रूप में खुद ब्रेक लगा देता है। मोटापा, थकान, अनिद्रा, बेचैनी, चिड़चिड़ापन — ये सब असंतुलन के संकेत हैं। बीमारी यहाँ समस्या नहीं होती, बीमारी संकेत होती है कि अब जीवन को संतुलन की जरूरत है।

मनुष्य का जीवन केवल काम, उपलब्धि और दौड़ का नाम नहीं है। जैसे गाड़ी को हर दस हजार किलोमीटर पर बैलेंसिंग की जरूरत होती है, वैसे ही मन, आत्मा और साँस को भी समय-समय पर संतुलन की जरूरत होती है।

समाधान:

आज व्यक्ति यह जानता ही नहीं कि मन, आत्मा और साँस को कैसे संतुलित किया जाए। इसी कारण, वह केवल दवाओं, डाइट और बाहरी उपायों में उलझा रहता है, जबकि असली समाधान भीतर से शुरू होता है। इस alignment का सबसे पहला, सबसे सरल और सबसे मानवीय उपाय है : ‘कृतज्ञता, दुआ एवं करुणा और क्षमा’ क्योंकि कृतज्ञता मन को वर्तमान में लाती है। दुआ मन को करुणा में ढालती है। क्षमा मन पर जमी पुरानी परतों को धीरे-धीरे उतारती है।

जब ये तीनों साँस के साथ जुड़ते हैं, तो मन को वही विश्राम मिलता है, जिसकी उसे वर्षों से जरूरत थी और जहाँ मन को विश्राम मिलता है, वहीं से स्वास्थ्य, संतुलन और जीवन की नई शुरुआत होती है।

क्षमा, कृतज्ञता व करुणा से वजन कैसे कम हो सकता है? इसका उत्तर मेडिकल साइंस से समझते हैं।

(1) कॉर्टिसोल (Cortisol) का विज्ञान:

जब आप किसी से नफरत करते हैं या मन में गुस्सा दबाकर रखते हैं, तो आपका शरीर स्ट्रेस मोड में रहता है। इस तनाव में शरीर ‘कॉर्टिसोल’ नाम का हार्मोन बनाता है। विज्ञान साबित कर चुका है कि शरीर में कॉर्टिसोल बढ़ने का मतलब है पेट के पास चर्बी का जमा होना। जब आप क्षमा करते हैं, तो तनाव खत्म होता है और कॉर्टिसोल का स्तर गिरते ही शरीर चर्बी (Fat) को जलाना शुरू कर देता है।

(2) पकड़ने और छोड़ने का सिद्धांत:

मोटापा क्या है? शरीर द्वारा ऊर्जा को पकड़कर रखना। जब हम पुरानी बातों और कड़वाहट को पकड़कर बैठते हैं, तो हमारा शरीर भी पकड़ने की आदत पाल लेता है। ‘क्षमा’ का मतलब है—Let go (छोड़ देना)। जैसे ही आप पुरानी बातों को बोझ छोड़ते हैं, आपका शरीर भी जमा हुई पुरानी चर्बी को छोड़ना शुरू कर देता है।

(3) इमोशनल ईटिंग (Emotional Eating) पर लगाम:

ज्यादातर लोग भूख की वजह से नहीं, बल्कि दुःख, खालीपन या गुस्से की वजह से ज्यादा खाते हैं। जब मन अशांत होता है, तो वह सुकून की तलाश खाने में करता है। कृतज्ञता (Gratitude) मन को अंदर से इतना भर देती है कि उसे बाहर से (जंक फूड या जरूरत से ज्यादा खाने से) सुकून ढूँढने की जरूरत नहीं पड़ती। मन तृप्त रहता है, तो पेट अपने आप कम भरता है।

(4) मेटाबॉलिज्म और जठराग्नि:

आयुर्वेद कहता है कि अशांत मन हमारी पाचन अग्नि को बुझा देता है। जब अग्नि मंद होती है, तो आप जो भी खाते हैं वह ऊर्जा नहीं, बल्कि आम (गंदगी/चर्बी) बन जाता है। दुआ और करुणा के भाव मन को शांत करते हैं, जिससे हमारी जठराग्नि तेज होती है और शरीर भोजन को चर्बी बनाने के बजाय ताकत में बदलने लगता है।

अतः बीमारी कोई दुश्मन नहीं, बल्कि संकेत है कि अब भीतर लौटने का समय है।

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