चिन्तामुक्त जीवन: How to live a worry-free life

चिन्तामुक्त जीवन: How to live a worry-free life

चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिसको कुछ न चाहिए, सोई शहंशाह॥

कैसे जागेगी चाह? कैसे विदा होगी अपेक्षा? जब भी हम शांत होकर पूजा, प्रार्थना या ध्यान में बैठते हैं, उसी समय हमारे मन में विचारों का बवंडर उठ खड़ा होता है। विचारों के कोलाहल की भीषणता को भी निर्विचार नहीं हो पाते। विचारों को रोकने की भरपूर कोशिश करने पर भी विचारों की श्रृंखला रुकती नहीं, बढ़ती ही जाती है।

चिन्तामुक्त जीवन: Worry-Free Life

विचारों को न ही रोकना हैं, न ही उनका समर्थन या सहयोग करना है। विचारों से न ही युद्ध करो, न ही देखो, न ही विचारों को दबाओ, न ही भागो और न ही उनमें दिलचस्पी लो।

पहले विषयों को द्रष्टा बनकर देखते रहो और बाद में देखते-देखते केवल उनके साक्षी रह जाओ।

हमारे मन में हर क्षण नाना प्रकार की आकांक्षाएँ, कामनाएँ उठती हैं: धन की, पद की, यश की, सम्मान की। ऐसी कामनाएँ हमें निष्काम, निर्विचार, निश्चिंत नहीं होने देतीं। कबीर कहते हैं:

तेरा तुझ प्रकार है कोई।
काम, क्रोध अरु लोभ विवर्जित,
हरिपद चीन्हे सोई॥

हमें प्रतिपल अपनी चाहों के प्रति सचेत होना होगा। जब भी कोई प्रतिकूलता आए, मनचाही, मनमानी पूरी न होने पर क्रोध आए, तो देखना है कि कौन-सी दृष्टा का हम अपेक्षा चाहते हैं। जहाँ किसी की उपस्थिति का क्रोध आया। यह क्रोध इसलिए आया कि हम अपेक्षा करते हैं, चाहते हैं कि कोई बेइज्जती, निंदा, छल, दगा या कपट न करे। हमारी चाहें, हमारी अपेक्षाएँ ही हमारी अशांति और क्षोभ का कारण हैं।

विचारों के प्रति सतत होशपूर्ण जागरण ही शांति, निर्विचारता, निष्कामता का मार्ग है। यही ज्ञान योग कहलाता है। हमें न तथ्य चाहिए, न दृष्टा। हमें दृष्टा और साक्षी होना है जो कि हमारा निज स्वभाव है।

दर्शक का अर्थ है दृष्टि दूसरे पर और दृष्टा का अर्थ है दृष्टि अपने पर। जब हमारी दृष्टि दृश्य पर अटक जाती है तो हम अपने को भूल जाते हैं और जब हमारी दृष्टि से सभी दृश्य विदा हो जाते हैं, हम ही रह जाते हैं, जागरण मात्र, तो हम स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। पतंजलि ऋषि अपने योग सूत्र में कहते हैं: ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।

हमारी वृत्ति इन्द्रियों के माध्यम से जब शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध के द्वारा विषयों के सम्पर्क में आती है तो वह विषयाकार हो जाती है। जो भी दृश्य वह देखती, सुनती या स्पर्श करती है, वैसी ही बनकर दृश्य की चाहना, कामना करने लगती है।

दृश्य बनने का मतलब है कि हम लोगों को भले कैसे लगें, सुन्दर कैसे लगें, श्रेष्ठ कैसे लगें। श्रेष्ठ होने की चाहना ही देखकर श्रेष्ठ लगने की चाहों में लग जाती है और उस दिखने की दौड़ में हम पाखण्डी बन जाते हैं। अपने व्यक्तित्व पर नकली मुखौटे ओढ़कर जीने लगते हैं और ऐसा जीवन हमारी अशांति का कारण बन जाता है।

Don't Worry - Be Happy: In every life we have some trouble But when you worry you make it double
Don’t Worry – Be Happy: In every life we have some trouble But when you worry you make it double

जब हमारी दृष्टि दृश्य से हटकर दृष्टा आती है तो न कुछ देखने की इच्छा रहती है, न दिखने की।

दृष्टा का दृश्य से तादात्म्य हमें स्वयं से पर में उलझा देता है। यह पर का आकर्षण, पर का सम्मोहन ही हमें निर्विचार और शांत नहीं होने देता। पतंजलि ऋषि बताते हैं कि वृत्ति शांत होने पर हम अपने स्वभाव में लौट आते हैं, हमें आत्मा का बोध हो जाता है।

विषयों की बाहरी दौड़ ही संसार और चित्तवृत्ति की अन्तर अस्थिरता ही परेशानी है, अध्यात्म है। जब हमारी चित्तवृत्ति अपने स्वयं से अन्य कुछ बनने की, कुछ पाने की, कुछ होने की कामना छोड़कर शांत हो जाती है तो आत्मबोध, ज्ञानानन्द, परमानन्द, ज्ञानानन्द आदि की प्राप्ति होती है।

अष्टावक्र कहते हैं: ‘मैं विशुद्ध बोध हूँ। न तो चरित्रवान हूँ, न चरित्रहीन, न मैं सुन्दर हूँ, न असुन्दर, न जवान, न बूढ़ा, न गोरा, न काला, न ब्राह्मण, न शूद्र। मैं इन सबका साक्षी हूँ। मैं शुद्ध बोध हूँ, मेरा कोई विकल्प नहीं है।‘ इस बात का अनुभव से जब निश्चय होगा, तभी क्रांति घटेगी।

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